स तत्कबन्धः प्रतिपद्य रूपं; वृतः श्रिया भास्करतुल्यदेहः ।
निदर्शयन्राममवेक्ष्य खस्थः; सख्यं कुरुष्वेति तदाभ्युवाच ॥
स तत्कबन्धः प्रतिपद्य रूपं; वृतः श्रिया भास्करतुल्यदेहः ।
निदर्शयन्राममवेक्ष्य खस्थः; सख्यं कुरुष्वेति तदाभ्युवाच ॥
अन्वयः
सः कबन्धः that Kabandha, तत् then, रूपम् his true form, प्रतिपद्य after attaining, श्रिया with radiance, वृतः surrounded, भास्करतुल्य देहः his body shining like the Sun, खस्थः from the sky, रामम् Rama, अवेक्ष्य seeing, निदर्शयन् while showing at, सख्यम् friendship, कुरुष्व make, इति this, तदा then, उवाच said.M N Dutt
Regaining his pristine beauty and shining in grace and effulgence that Kabandha, who was on the sky, fixing his looks upon Rāma, and pointing out to him his way, said Do you make friends with (Sugrīva).Summary
Kabandha assumed his true form, his body shining like the radiance of the Sun. He stood in the sky showing his form and looking at Rama, said, Make friendship with Sugriva.इत्यार्ष श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे त्रिसप्ततितमस्सर्गः॥Thus ends the seventythird sarga of Aranyakanda of the holy Ramayana the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| तत् | तद् (२.१) |
| कबन्धः | कबन्ध (१.१) |
| प्रतिपद्य | प्रतिपद्य (√प्रति-पद् + ल्यप्) |
| रूपं | रूप (२.१) |
| वृतः | वृत (√वृ + क्त, १.१) |
| श्रिया | श्री (३.१) |
| भास्करतुल्यदेहः | भास्कर–तुल्य–देह (१.१) |
| निदर्शयन् | निदर्शयत् (√नि-दर्शय् + शतृ, ८.१) |
| रामम् | राम (२.१) |
| अवेक्ष्य | अवेक्ष्य (√अव-ईक्ष् + ल्यप्) |
| खस्थः | ख–स्थ (१.१) |
| सख्यं | सख्य (२.१) |
| कुरुष्वेति | कुरुष्व (√कृ लोट् म.पु. )–इति (अव्ययः) |
| तदाभ्युवाच | तदा (अव्ययः)–अभ्युवाच (√अभि-वच् लिट् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | त | त्क | ब | न्धः | प्र | ति | प | द्य | रू | पं |
| वृ | तः | श्रि | या | भा | स्क | र | तु | ल्य | दे | हः |
| नि | द | र्श | य | न्रा | म | म | वे | क्ष्य | ख | स्थः |
| स | ख्यं | कु | रु | ष्वे | ति | त | दा | भ्यु | वा | च |