ततो महद्वर्त्म च दूरसंक्रमं; क्रमेण गत्वा प्रविलोकयन्वनम् ।
ददर्श पम्पां शुभदर्श कानना;मनेकनानाविधपक्षिसंकुलाम् ॥
ततो महद्वर्त्म च दूरसंक्रमं; क्रमेण गत्वा प्रविलोकयन्वनम् ।
ददर्श पम्पां शुभदर्श कानना;मनेकनानाविधपक्षिसंकुलाम् ॥
अन्वयः
ततः then, सुदूरसङ्क्रमम् extending to a distance, महत् great, वर्त्म path, क्रमेण gradually, गत्वा after going, वनम् forest, प्रविलोकयन् while observing, शुभदर्शकाननाम् surrounded by beautiful forests, अनेकनानाविधपक्षिजालकाम् many varieties of birds, पम्पाम् Pampa, ददर्श saw.M N Dutt
Proceeding slowly, observing the forest, Rāma beheld and entered with Lakşmaņa Pampā, girt on all sides with beautiful woods and filled with a multitude of diverse birds.Summary
Thereafter, going slowly to a distance, Rama and Lakshmana saw Pampa surrounded by beautiful forests full of many varieties of birds.इत्यार्ष श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे पञ्चसप्ततिमस्सर्गः॥Thus ends the seventyfifth sarga of Aranyakanda of the holy Ramayana the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| ततो | ततस् (अव्ययः) |
| महद् | महत् (२.१) |
| वर्त्म | वर्त्मन् (२.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| दूरसंक्रमं | दूर–संक्रम (२.१) |
| क्रमेण | क्रमेण (अव्ययः) |
| गत्वा | गत्वा (√गम् + क्त्वा) |
| प्रविलोकयन् | प्रविलोकयत् (√प्रवि-लोकय् + शतृ, १.१) |
| वनम् | वन (२.१) |
| ददर्श | ददर्श (√दृश् लिट् प्र.पु. एक.) |
| पम्पां | पम्पा (२.१) |
| शुभदर्शकाननाम् | शुभदर्श–कानन (२.१) |
| अनेकनानाविधपक्षिसंकुलाम् | अनेक–नानाविध–पक्षिन्–संकुल (२.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तो | म | ह | द्व | र्त्म | च | दू | र | सं | क्र | मं |
| क्र | मे | ण | ग | त्वा | प्र | वि | लो | क | य | न्व | नम् |
| द | द | र्श | प | म्पां | शु | भ | द | र्श | का | न | ना |
| म | ने | क | ना | ना | वि | ध | प | क्षि | सं | कु | लाम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||