ततस्त्वां प्रस्थितं दृष्ट्वा मम चिन्ताकुलं मनः ।
त्वद्वृत्तं चिन्तयन्त्या वै भवेन्निःश्रेयसं हितम् ॥
ततस्त्वां प्रस्थितं दृष्ट्वा मम चिन्ताकुलं मनः ।
त्वद्वृत्तं चिन्तयन्त्या वै भवेन्निःश्रेयसं हितम् ॥
अन्वयः
ततः therefore, प्रस्थितम् present, त्वाम् you, दृष्ट्वा seeing, मम to me, मनः mind, चिन्ताकुलम् is worried, त्वद्वृत्तम् your stand, चिन्तयन्त्याः while I reflect, हितम् salutary, निश्रेयसम् final benefit, भवेत् वै it is wished.M N Dutt
Seeing you set out, my mind reflecting on your truthfulness as well as your happiness in this world and welfare in the next, is wrought up with anxiety.Summary
I am, therefore, worried in my mind when I see you here and think of your wellbeing. I wish your ultimate good. [The next two lines appear, more or less, a repetition. So omitted : Editor]पदच्छेदः
| ततस् | ततस् (अव्ययः) |
| त्वां | त्वद् (२.१) |
| प्रस्थितं | प्रस्थित (√प्र-स्था + क्त, २.१) |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश् + क्त्वा) |
| मम | मद् (६.१) |
| चिन्ताकुलं | चिन्ता–आकुल (१.१) |
| मनः | मनस् (१.१) |
| त्वद्वृत्तं | त्वद्–वृत्त (२.१) |
| चिन्तयन्त्या | चिन्तयत् (√चिन्तय् + शतृ, ६.१) |
| वै | वै (अव्ययः) |
| भवेन् | भवेत् (√भू विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| निःश्रेयसं | निःश्रेयस (१.१) |
| हितम् | हित (१.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त | स्त्वां | प्र | स्थि | तं | दृ | ष्ट्वा |
| म | म | चि | न्ता | कु | लं | म | नः |
| त्व | द्वृ | त्तं | चि | न्त | य | न्त्या | वै |
| भ | वे | न्निः | श्रे | य | सं | हि | तम् |