अन्वयः
आत्मनः my own, राज्यम् kingdom, प्रार्थयता by desiring, सुग्रीवेण by Sugriva, नृशंसेन by the wicked one, अनेन by him, भ्रातृसौहृदम् brotherly love, विस्मृत्य forgetting, अहम् I, तत्र there, अस्मि I am, संरुध्दः I was obstructed
M N Dutt
Seeking my kingdom, the crafty Sugrīva had shut me up there forgetting fraternal love.'
Summary
'I was obstructed by wicked Sugriva who forgot his brotherly love and was desiring the kingdom, which belongs to me.'
पदच्छेदः
| तत्रानेनास्मि | तत्र (अव्ययः)–इदम् (३.१)–अस्मि (√अस् लट् उ.पु. ) |
| संरुद्धो | संरुद्ध (√सम्-रुध् + क्त, १.१) |
| राज्यं | राज्य (२.१) |
| मार्गयतात्मनः | मार्गयत् (√मार्गय् + शतृ, ३.१)–आत्मन् (६.१) |
| सुग्रीवेण | सुग्रीव (३.१) |
| नृशंसेन | नृशंस (३.१) |
| विस्मृत्य | विस्मृत्य (√वि-स्मृ + ल्यप्) |
| भ्रातृसौहृदम् | भ्रातृ–सौहृद (२.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| त | त्रा | ने | ना | स्मि | सं | रु | द्धो |
| रा | ज्यं | मा | र्ग | य | ता | त्म | नः |
| सु | ग्री | वे | ण | नृ | शं | से | न |
| वि | स्मृ | त्य | भ्रा | तृ | सौ | हृ | दम् |