किमङ्गदं साङ्गद वीर बाहो; विहाय यास्यद्य चिरप्रवासं ।
न युक्तमेवं गुणसंनिकृष्टं; विहाय पुत्रं प्रियपुत्र गन्तुम् ॥
किमङ्गदं साङ्गद वीर बाहो; विहाय यास्यद्य चिरप्रवासं ।
न युक्तमेवं गुणसंनिकृष्टं; विहाय पुत्रं प्रियपुत्र गन्तुम् ॥
अन्वयः
साङ्गदवीरबाहो O hero adorned with armlets, अङ्गदम् Angada, विहाय deserting, चिरप्रवासम् on a long journey, किम् why, प्रयातः असि going, गुणसन्निकृष्टम् with qualities like yours, प्रियपुत्र your dear son, पुत्रम् son, एवम् this way, न युक्तम् not proper to go.M N Dutt
O hero, having Arigada on your arms, why are you proceeding on a journey for good in a foreign land leaving behind (your son) Angada. It does not behove you (to leave aside) your dear son, gifted with diverse accomplishments and wearing a charming and beautiful cloth.Summary
'O hero, adorned with armlets, why have you departed on a long journey, deserting your dear son Angada who possesses similar virtues like you? It is not proper.पदच्छेदः
| किम् | क (२.१) |
| अङ्गदं | अङ्गद (२.१) |
| साङ्गद | स (अव्ययः)–अङ्गद (८.१) |
| वीरबाहो | वीर–बाहु (८.१) |
| विहाय | विहाय (√वि-हा + ल्यप्) |
| यास्य् | यासि (√या लट् म.पु. ) |
| अद्य | अद्य (अव्ययः) |
| चिरप्रवासम् | चिर–प्रवास (२.१) |
| न | न (अव्ययः) |
| युक्तम् | युक्त (√युज् + क्त, १.१) |
| एवं | एवम् (अव्ययः) |
| गुणसंनिकृष्टं | गुण–संनिकृष्ट (√संनि-कृष् + क्त, २.१) |
| विहाय | विहाय (√वि-हा + ल्यप्) |
| पुत्रं | पुत्र (२.१) |
| प्रियपुत्र | प्रिय–पुत्र (८.१) |
| गन्तुम् | गन्तुम् (√गम् + तुमुन्) |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कि | म | ङ्ग | दं | सा | ङ्ग | द | वी | र | बा | हो |
| वि | हा | य | या | स्य | द्य | चि | र | प्र | वा | सं |
| न | यु | क्त | मे | वं | गु | ण | सं | नि | कृ | ष्टं |
| वि | हा | य | पु | त्रं | प्रि | य | पु | त्र | ग | न्तुम् |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||