मेघाभिकामी परिसंपतन्ती; संमोदिता भाति बलाकपङ्क्तिः ।
वातावधूता वरपौण्डरीकी; लम्बेव माला रचिताम्बरस्य ॥
मेघाभिकामी परिसंपतन्ती; संमोदिता भाति बलाकपङ्क्तिः ।
वातावधूता वरपौण्डरीकी; लम्बेव माला रचिताम्बरस्य ॥
अन्वयः
मेघाभिकामा longing for clouds, परिसम्पतन्ती flying along, सम्मोदिता rejoiced, बलाकपङ्क्ति: row of cranes, अम्बरस्य in the sky, वातावधूता shaken by the wind, वरपौण्डरीकी of the choice white lotuses, रचिता strung, लम्बा hanging, माला इव resemling garlands, भाति appears.M N Dutt
And rows of cranes, fond of clouds, rising up in the sky, delighted and moved by the wind, are appearing like a garland of white lotuses, spread along the welkin.Summary
'The happy rows of herons flying in the sky to meet the clouds, appear like a long garland of choice white lotuses strung together hanging in the sky.पदच्छेदः
| मेघाभिकामा | मेघ–अभिकाम (१.१) |
| परिसंपतन्ती | परिसंपतत् (√परिसम्-पत् + शतृ, १.१) |
| संमोदिता | संमोदित (√सम्-मोदय् + क्त, १.१) |
| भाति | भाति (√भा लट् प्र.पु. एक.) |
| बलाकपङ्क्तिः | बलाक–पङ्क्ति (१.१) |
| वातावधूता | वात–अवधूत (√अव-धू + क्त, १.१) |
| वरपौण्डरीकी | वर–पौण्डरीक (१.१) |
| लम्बेव | लम्ब (१.१)–इव (अव्ययः) |
| माला | माला (१.१) |
| रचिताम्बरस्य | रचित (√रचय् + क्त, १.१)–अम्बर (६.१) |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मे | घा | भि | का | मी | प | रि | सं | प | त | न्ती |
| सं | मो | दि | ता | भा | ति | ब | ला | क | प | ङ्क्तिः |
| वा | ता | व | धू | ता | व | र | पौ | ण्ड | री | की |
| ल | म्बे | व | मा | ला | र | चि | ता | म्ब | र | स्य |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||