तमात्तबाणासनमुत्पतन्तं; निवेदितार्थं रणचण्डकोपम् ।
उवच रामः परवीरहन्ता; स्ववेक्षितं सानुनयं च वाक्यम् ॥
तमात्तबाणासनमुत्पतन्तं; निवेदितार्थं रणचण्डकोपम् ।
उवच रामः परवीरहन्ता; स्ववेक्षितं सानुनयं च वाक्यम् ॥
अन्वयः
परवीरहन्ता a slayer of enemy heroes, रामः Rama, निवेदितार्थम् who seek refuge, रणचण्डकोपम् fierce in war, आत्तबाणासनम् wielding bow and arrow, उत्पतन्तम् suddenly standing up, तम् him, स्ववेक्षितम् his own angle of vision, सानुनयं च in a conciliatory tone, वाक्यम् these words, उवाच spoke.M N Dutt
Beholding him rise up from the seat with bow in his hand and greatly wrought up with anger and hearing him thus announce his intention about the destruction of Sugriva, Rama, the slayer of foes, spoke to him the following humble words worthy of being spoken on that occasion.Summary
Rama, a slayer of enemy heroes but not of those who seek his refuge, spoke in a conciliatory tone to Lakshmana who jumped, wielding bow and arrows, inspired with his fierce fighting spirit.पदच्छेदः
| तम् | तद् (२.१) |
| आत्तबाणासनम् | आत्त (√आ-दा + क्त)–बाणासन (२.१) |
| उत्पतन्तं | उत्पतत् (√उत्-पत् + शतृ, २.१) |
| निवेदितार्थं | निवेदित (√नि-वेदय् + क्त)–अर्थ (२.१) |
| रणचण्डकोपम् | रण–चण्ड–कोप (२.१) |
| उवाच | उवाच (√वच् लिट् प्र.पु. एक.) |
| रामः | राम (१.१) |
| परवीरहन्ता | पर–वीर–हन्तृ (१.१) |
| स्ववेक्षितं | स्ववेक्षित (२.१) |
| सानुनयं | सानुनय (२.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| वाक्यम् | वाक्य (२.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | मा | त्त | बा | णा | स | न | मु | त्प | त | न्तं |
| नि | वे | दि | ता | र्थं | र | ण | च | ण्ड | को | पम् |
| उ | व | च | रा | मः | प | र | वी | र | ह | न्ता |
| स्व | वे | क्षि | तं | सा | नु | न | यं | च | वा | क्यम् |