अथाहं कृतबुद्धिस्तु सुव्यक्तं निहतो गुरुः ।
शिलापर्वतसंकाशा बिलद्वारि मया कृता ।
अशक्नुवन्निष्क्रमितुं महिषो विनशेदिति ॥
अथाहं कृतबुद्धिस्तु सुव्यक्तं निहतो गुरुः ।
शिलापर्वतसंकाशा बिलद्वारि मया कृता ।
अशक्नुवन्निष्क्रमितुं महिषो विनशेदिति ॥
अन्वयः
अथ then, गुरुः brother Vali, सुव्यक्तम् it is evident, निहतः killed, अहम् I, कृतबुद्धिः I thought, महिषः buffalo, निष्क्रमितुम् to return, अशक्नुवन् being unable, विनशेदिति should be destroyed, मया by myself, पर्वतसङ्काशा of the mountain size, शिला rock, बिलद्वारि at the entrance of, कृता placed.M N Dutt
And I, losing my sense, thought that my superior had for certain been slain. And I placed ७ crag huge as a hill at the mouth of the cave. took to mySummary
'Thereafter, convinced that my brother was killed, I placed a mountainsize rock at the entrance of the cave so that Dundubhi will be destroyed, unable to come out of the cave.पदच्छेदः
| अथाहं | अथ (अव्ययः)–मद् (१.१) |
| कृतबुद्धिस् | कृतबुद्धि (१.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| सुव्यक्तं | सु (अव्ययः)–व्यक्त (२.१) |
| निहतो | निहत (√नि-हन् + क्त, १.१) |
| गुरुः | गुरु (१.१) |
| शिला | शिला (१.१) |
| पर्वतसंकाशा | पर्वत–संकाश (१.१) |
| बिलद्वारि | बिल–द्वार् (७.१) |
| मया | मद् (३.१) |
| कृता | कृत (√कृ + क्त, १.१) |
| अशक्नुवन् | अशक्नुवत् (१.१) |
| निष्क्रमितुं | निष्क्रमितुम् (√निः-क्रम् + तुमुन्) |
| महिषो | महिष (१.१) |
| विनशेद् | विनशेत् (√वि-नश् विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| इति | इति (अव्ययः) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | था | हं | कृ | त | बु | द्धि | स्तु | सु | व्य | क्तं | नि |
| ह | तो | गु | रुः | शि | ला | प | र्व | त | सं | का | शा |
| बि | ल | द्वा | रि | म | या | कृ | ता | अ | श | क्नु | व |
| न्नि | ष्क्र | मि | तुं | म | हि | षो | वि | न | शे | दि | ति |