M N Dutt
It behove you to save us, exercised with fear for Sugriva,-who, happening to override Sugriva's command, shall lose our lives. And, further, O you that practisest righteousness, great is the task that is to be performed by us.
पदच्छेदः
| तस्मात् | तद् (५.१) |
| सुग्रीववचनाद् | सुग्रीव–वचन (५.१) |
| अतिक्रान्तान् | अतिक्रान्त (√अति-क्रम् + क्त, २.३) |
| गतायुषः | गत (√गम् + क्त)–आयुस् (२.३) |
| त्रातुम् | त्रातुम् (√त्रा + तुमुन्) |
| अर्हसि | अर्हसि (√अर्ह् लट् म.पु. ) |
| नः | मद् (२.३) |
| सर्वान् | सर्व (२.३) |
| सुग्रीवभयशङ्कितान् | सुग्रीव–भय–शङ्कित (√शङ्क् + क्त, २.३) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| त | स्मा | त्सु | ग्री | व | व | च | ना |
| द | ति | क्रा | न्ता | न्ग | ता | यु | षः |
| त्रा | तु | म | र्ह | सि | नः | स | र्वा |
| न्सु | ग्री | व | भ | य | श | ङ्कि | तान् |