पदच्छेदः
| अचरत् | अचरत् (√चर् लङ् प्र.पु. एक.) |
| पर्वतस्याग्रे | पर्वत (६.१)–अग्र (७.१) |
| प्रावृडम्बुदसंनिभे | प्रावृष्–अम्बुद–संनिभ (७.१) |
| विचित्रमाल्याभरणा | विचित्र–माल्य–आभरण (१.१) |
| महार्हक्षौमवासिनी | महार्ह–क्षौम–वासिन् (१.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | च | र | त्प | र्व | त | स्या | ग्रे |
| प्रा | वृ | ड | म्बु | द | सं | नि | भे |
| वि | चि | त्र | मा | ल्या | भ | र | णा |
| म | हा | र्ह | क्षौ | म | वा | सि | नी |