वासवस्य सवज्रस्य ब्रह्मणो वा स्वयम्भुवः ।
विक्रम्य सहसा हस्तादमृतं तदिहानये ।
लङ्कां वापि समुत्क्षिप्य गच्छेयमिति मे मतिः ॥
वासवस्य सवज्रस्य ब्रह्मणो वा स्वयम्भुवः ।
विक्रम्य सहसा हस्तादमृतं तदिहानये ।
लङ्कां वापि समुत्क्षिप्य गच्छेयमिति मे मतिः ॥
अन्वयः
विक्रम्य after advancing, सवज्रस्य of that Indra the wielder of thunderbolt, वासवस्य Vasava's, स्वयम्भुवः of the self born, ब्रह्मणो वा of the ceator Brahma even, हस्तात् from his hand, सहसा at once, अमृतम् nectar, इह here, आनये I will get, लङ्काम् Lanka, समुत्क्षिप्य वापि uprooting, गच्छेयम् I can go, इति this way, मे my, मतिः feel in mind.M N Dutt
I can, suddenly summoning energy, bring hither ambrosia from the very grasp of Vāsava or Brahmā himself. I shall leap sheer over Lankā. Even this is my impression.Summary
'I think I can encounter Indra, wielder of the thunderbolt and obtain nectar from his hands. I can even confront Brahma, the selfborn creator courageously. I can even uproot Lanka and carry it.'पदच्छेदः
| वासवस्य | वासव (६.१) |
| सवज्रस्य | स (अव्ययः)–वज्र (६.१) |
| ब्रह्मणो | ब्रह्मन् (६.१) |
| वा | वा (अव्ययः) |
| स्वयम्भुवः | स्वयम्भु (६.१) |
| विक्रम्य | विक्रम्य (√वि-क्रम् + ल्यप्) |
| सहसा | सहस् (३.१) |
| हस्ताद् | हस्त (५.१) |
| अमृतं | अमृत (२.१) |
| तद् | तद् (२.१) |
| इहानये | इह (अव्ययः)–आनये (√आ-नी लङ् उ.पु. ) |
| लङ्कां | लङ्का (२.१) |
| वापि | वा (अव्ययः)–अपि (अव्ययः) |
| समुत्क्षिप्य | समुत्क्षिप्य (√समुत्-क्षिप् + ल्यप्) |
| गच्छेयम् | गच्छेयम् (√गम् विधिलिङ् उ.पु. ) |
| इति | इति (अव्ययः) |
| मे | मद् (६.१) |
| मतिः | मति (१.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वा | स | व | स्य | स | व | ज्र | स्य | ब्र | ह्म | णो | वा |
| स्व | य | म्भु | वः | वि | क्र | म्य | स | ह | सा | ह | स्ता |
| द | मृ | तं | त | दि | हा | न | ये | ल | ङ्कां | वा | पि |
| स | मु | त्क्षि | प्य | ग | च्छे | य | मि | ति | मे | म | तिः |