अन्वयः
स्वयंप्रभैः the selfeffulgent ones, भ्राजमानैः glittering , जातरूपमयैः golden, शृङ्गैः by the peak, सः that, गिरिसत्तमः noble mountain, आदित्यशतसङ्काशः like a thousand Suns, अभवत् appeared.
Summary
The noble mountain, Mainaka was glittering like a thousand Suns with selfeffulgent golden peaks shining.
पदच्छेदः
| जातरूपमयैः | जातरूप–मय (३.३) |
| शृङ्गैर् | शृङ्ग (३.३) |
| भ्राजमानैः | भ्राजमान (√भ्राज् + शानच्, ३.३) |
| स्वयंप्रभैः | स्वयम्प्रभ (३.३) |
| आदित्यशतसंकाशः | आदित्य–शत–संकाश (१.१) |
| सो | तद् (१.१) |
| ऽभवद् | अभवत् (√भू लङ् प्र.पु. एक.) |
| गिरिसत्तमः | गिरि–सत्तम (१.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| जा | त | रू | प | म | यैः | शृ | ङ्गै |
| र्भ्रा | ज | मा | नैः | स्व | यं | प्र | भैः |
| आ | दि | त्य | श | त | सं | का | शः |
| सो | ऽभ | व | द्गि | रि | स | त्त | मः |