तमाकाशगतं वीरमाकाशे समवस्थितम् ।
प्रीतो हृष्टमना वाक्यमब्रवीत्पर्वतः कपिम् ।
मानुषं धरयन्रूपमात्मनः शिखरे स्थितः ॥
तमाकाशगतं वीरमाकाशे समवस्थितम् ।
प्रीतो हृष्टमना वाक्यमब्रवीत्पर्वतः कपिम् ।
मानुषं धरयन्रूपमात्मनः शिखरे स्थितः ॥
अन्वयः
पर्वतः mountain, प्रीतः feeling happy, हृष्टमानाः gladly, मानुषम् human, रूपम् form, धारयन् assuming, आत्मनः his, शिखरे on the summit, स्थितः standing, आकाशगतम् gone to the aerial region, तं वीरं कपिम् that heroic vanara, आकाशे in the sky, समुपस्थितः stood, वाक्यम् these words, अब्रवीत् said.M N Dutt
Thereupon, with a glad heart assuming the semblance of a man ånd stationing himself upon his own summit, that mountain-chief addressed Hanumān, saying.Summary
Now the mountain assumed a human form and standing on its own summit, which stood very high, and glad at heart, addressed the heroic vanara gone to the aerial region.पदच्छेदः
| तम् | तद् (२.१) |
| आकाशगतं | आकाश–गत (√गम् + क्त, २.१) |
| वीरम् | वीर (२.१) |
| आकाशे | आकाश (७.१) |
| समवस्थितम् | समवस्थित (√समव-स्था + क्त, २.१) |
| प्रीतो | प्रीत (√प्री + क्त, १.१) |
| हृष्टमना | हृष्ट (√हृष् + क्त)–मनस् (१.१) |
| वाक्यम् | वाक्य (२.१) |
| अब्रवीत् | अब्रवीत् (√ब्रू लङ् प्र.पु. एक.) |
| पर्वतः | पर्वत (१.१) |
| कपिम् | कपि (२.१) |
| मानुषं | मानुष (२.१) |
| धारयन् | धारयत् (√धारय् + शतृ, १.१) |
| रूपम् | रूप (२.१) |
| आत्मनः | आत्मन् (६.१) |
| शिखरे | शिखर (७.१) |
| स्थितः | स्थित (√स्था + क्त, १.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | मा | का | श | ग | तं | वी | र | मा | का | शे | स |
| म | व | स्थि | तम् | प्री | तो | हृ | ष्ट | म | ना | वा | क्य |
| म | ब्र | वी | त्प | र्व | तः | क | पिम् | मा | नु | षं | ध |
| र | य | न्रू | प | मा | त्म | नः | शि | ख | रे | स्थि | तः |