एवं तु मत्वा हनुमान्महात्मा; प्रतीक्षमाणो मनुजेन्द्रपत्नीम् ।
अवेक्षमाणश्च ददर्श सर्वं; सुपुष्पिते पर्णघने निलीनः ॥
एवं तु मत्वा हनुमान्महात्मा; प्रतीक्षमाणो मनुजेन्द्रपत्नीम् ।
अवेक्षमाणश्च ददर्श सर्वं; सुपुष्पिते पर्णघने निलीनः ॥
अन्वयः
महात्मा highsouled, हनुमान् Hanuman, एवम् thus, मत्वा pondering, मनुजेन्द्रपत्नीम् wife of the lord of the people, प्रतीक्षमाणः waiting, सुपुष्पिते on a profusely bloomed, पर्णघने abundant leaves, निलीनः hid himself, अवेक्षमाणश्च looking down, सर्वम् all over, ददर्श saw.M N Dutt
Having arrived there and anxiously expecting the appearance of the spouse of that lord of men, the high-souled Hanumān hiding himself (on the Singsapa tree) enveloped with flowers and leaves, beheld all.Summary
Pondering thus, the highsouled Hanuman remained concealed on the tree loaded with flowers and leaves and waited, looking eagerly for the wife of the lord of the people. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुर्दशस्सर्गः।Thus ends the fourteenth sarga of Sundarakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| एवं | एवम् (अव्ययः) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| मत्वा | मत्वा (√मन् + क्त्वा) |
| हनुमान्महात्मा | हनुमन्त् (१.१)–महात्मन् (१.१) |
| प्रतीक्षमाणो | प्रतीक्षमाण (√प्रति-ईक्ष् + शानच्, १.१) |
| मनुजेन्द्रपत्नीम् | मनुज–इन्द्र–पत्नी (२.१) |
| अवेक्षमाणश्च | अवेक्षमाण (√अव-ईक्ष् + शानच्, १.१)–च (अव्ययः) |
| ददर्श | ददर्श (√दृश् लिट् प्र.पु. एक.) |
| सर्वं | सर्व (२.१) |
| सुपुष्पिते | सु (अव्ययः)–पुष्पित (७.१) |
| पर्णघने | पर्ण–घन (७.१) |
| निलीनः | निलीन (√नि-ली + क्त, १.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | वं | तु | म | त्वा | ह | नु | मा | न्म | हा | त्मा |
| प्र | ती | क्ष | मा | णो | म | नु | जे | न्द्र | प | त्नीम् |
| अ | वे | क्ष | मा | ण | श्च | द | द | र्श | स | र्वं |
| सु | पु | ष्पि | ते | प | र्ण | घ | ने | नि | ली | नः |