न हि वैदेहि रामस्त्वां द्रष्टुं वाप्युपलप्स्यते ।
पुरो बलाकैरसितैर्मेघैर्ज्योत्स्नामिवावृताम् ॥
न हि वैदेहि रामस्त्वां द्रष्टुं वाप्युपलप्स्यते ।
पुरो बलाकैरसितैर्मेघैर्ज्योत्स्नामिवावृताम् ॥
अन्वयः
वैदेहि Vaidehi, रामः Rama, त्वाम् you, पुरोबलाकैः cranes in front, असितैः dark , मेघैः clouds, आवृताम् veiled, ज्योत्स्नामिव like moonbeams, द्रष्टुं वापि even to see, न हि उपलप्स्यते not possible.M N Dutt
O Vaidehī, Rāma shall not be able to see you like to the rays of the moon covered with blue clouds preceded by Balākās.* Rāghava shall never get you back from my hands, like to Hiranyakaśipu unable to regain his wife Kirti from Indra. *A kind of crane.Summary
"O Vaidehi I wonder if Rama can see you at all. You are like moonlight veiled by dark clouds and cannot be seen even by the flying cranes.पदच्छेदः
| न | न (अव्ययः) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| वैदेहि | वैदेही (८.१) |
| रामस्त्वां | राम (१.१)–त्वद् (२.१) |
| द्रष्टुं | द्रष्टुम् (√दृश् + तुमुन्) |
| वाप्युपलप्स्यते | वा (अव्ययः)–अपि (अव्ययः)–उपलप्स्यते (√उप-लभ् लृट् प्र.पु. एक.) |
| पुरो | पुरस् (अव्ययः) |
| बलाकैर् | बलाक (३.३) |
| असितैर् | असित (३.३) |
| मेघैर् | मेघ (३.३) |
| ज्योत्स्नाम् | ज्योत्स्ना (२.१) |
| इवावृताम् | इव (अव्ययः)–आवृत (√आ-वृ + क्त, २.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | हि | वै | दे | हि | रा | म | स्त्वां |
| द्र | ष्टुं | वा | प्यु | प | ल | प्स्य | ते |
| पु | रो | ब | ला | कै | र | सि | तै |
| र्मे | घै | र्ज्यो | त्स्ना | मि | वा | वृ | ताम् |