अन्वयः
वेपमानाम् trembling in fear, ताम् her, समन्ततः from all around, अभिक्रम्य approaching, सङ्कृद्धाः enraged, दीप्तान् glowing, प्रलम्बान् hanging, दशनच्छदान् lips, भृशम् again and again, संलिलिहुः were licking.
M N Dutt
Those, influenced with ire, approached the trembling Sītā and encircling her, licked again and again their long a burning lips.
Summary
Sita was trembling in fear. The enraged ogresses went on licking their lips hanging, again and again.
पदच्छेदः
| ताम् | तद् (२.१) |
| अभिक्रम्य | अभिक्रम्य (√अभि-क्रम् + ल्यप्) |
| संरब्धा | संरब्ध (१.३) |
| वेपमानां | वेपमान (√विप् + शानच्, २.१) |
| समन्ततः | समन्ततः (अव्ययः) |
| भृशं | भृशम् (अव्ययः) |
| संलिलिहुर् | संलिलिहुः (√सम्-लिह् लिट् प्र.पु. बहु.) |
| दीप्तान् | दीप्त (√दीप् + क्त, २.३) |
| प्रलम्बदशनच्छदान् | प्रलम्ब–दशनच्छद (२.३) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| ता | म | भि | क्र | म्य | सं | र | ब्धा |
| वे | प | मा | नां | स | म | न्त | तः |
| भृ | शं | सं | लि | लि | हु | र्दी | प्ता |
| न्प्र | ल | म्ब | द | श | न | च्छ | दान् |