सा राक्षसेन्द्रस्य वचो निशम्य; तद्रावणस्याप्रियमप्रियार्ता ।
सीता वितत्रास यथा वनान्ते; सिंहाभिपन्ना गजराजकन्या ॥
सा राक्षसेन्द्रस्य वचो निशम्य; तद्रावणस्याप्रियमप्रियार्ता ।
सीता वितत्रास यथा वनान्ते; सिंहाभिपन्ना गजराजकन्या ॥
अन्वयः
सा सीता that Sita, राक्षसेन्द्रस्य demon king's, रावणस्य Ravana's, अप्रियम् unpleasant news, तत् that, वचः word, निशम्य after hearing, अप्रियार्ता restless, वनान्ते in the midst of the forest, सिंहाभिपन्ना caught by the lion, गजराजकन्या यथा like young calf of a lordly elephant, वितत्रास frightened.M N Dutt
Hearing those unpleasant words of Rāvana, the lord of Rāksasas, Sītā, racked with sorrow on account of her husband, became terrified, like to a she-elephant, worsted by a lion on the skirt of a forest.Summary
After hearing the unpleasant words spoken by the king of demons, which caused restlessness and sorrow to Sita, she was terrified like the young calf of a lordly elephant fallen into the clutches of a lion in the midst of the forest.पदच्छेदः
| सा | तद् (१.१) |
| राक्षसेन्द्रस्य | राक्षस–इन्द्र (६.१) |
| वचो | वचस् (२.१) |
| निशम्य | निशम्य (√नि-शामय् + ल्यप्) |
| तद् | तद् (२.१) |
| रावणस्याप्रियम् | रावण (६.१)–अप्रिय (२.१) |
| अप्रियार्ता | अप्रिय–आर्त (१.१) |
| सीता | सीता (१.१) |
| वितत्रास | वितत्रास (√वि-त्रस् लिट् प्र.पु. एक.) |
| यथा | यथा (अव्ययः) |
| वनान्ते | वनान्त (७.१) |
| सिंहाभिपन्ना | सिंह–अभिपन्न (√अभि-पद् + क्त, १.१) |
| गजराजकन्या | गज–राजन्–कन्या (१.१) |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सा | रा | क्ष | से | न्द्र | स्य | व | चो | नि | श | म्य |
| त | द्रा | व | ण | स्या | प्रि | य | म | प्रि | या | र्ता |
| सी | ता | वि | त | त्रा | स | य | था | व | ना | न्ते |
| सिं | हा | भि | प | न्ना | ग | ज | रा | ज | क | न्या |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||