पितुर्निर्देशं नियमेन कृत्वा; वनान्निवृत्तश्चरितव्रतश्च ।
स्त्रीभिस्तु मन्ये विपुलेक्षणाभिः; संरंस्यसे वीतभयः कृतार्थः ॥
पितुर्निर्देशं नियमेन कृत्वा; वनान्निवृत्तश्चरितव्रतश्च ।
स्त्रीभिस्तु मन्ये विपुलेक्षणाभिः; संरंस्यसे वीतभयः कृतार्थः ॥
अन्वयः
त्वम् you, पितुः father's, निदेशम् command, नियमेन truly, कृत्वा following, चरितव्रतश्च after the completion of the pledge, वनात् from the forest, निवृत्तः you return, वीतभयः rid of fear, कृतार्थः an accomplished one, विपुलेक्षणाभिः largeeyed, स्त्रीभिः with damsels, रंस्यसे be revelling, मन्ये I think.M N Dutt
And duly satisfying your sire's command, and returning successfully from the forest, you shall fearlessly sport with many a damsel having large eyes.Summary
"Having truly fulfilled your pledge given to your father, you will return from the forest to Ayodhya, rid of all fear, as an accomplished person, will and revel in the company of largeeyed damsels, I think.पदच्छेदः
| पितुर् | पितृ (६.१) |
| निर्देशं | निर्देश (२.१) |
| नियमेन | नियम (३.१) |
| कृत्वा | कृत्वा (√कृ + क्त्वा) |
| वनान्निवृत्तश्चरितव्रतश्च | वन (५.१)–निवृत्त (√नि-वृत् + क्त, १.१)–चरित (√चर् + क्त)–व्रत (१.१)–च (अव्ययः) |
| स्त्रीभिस्तु | स्त्री (३.३)–तु (अव्ययः) |
| मन्ये | मन्ये (√मन् लट् उ.पु. ) |
| विपुलेक्षणाभिः | विपुल–ईक्षण (३.३) |
| संरंस्यसे | संरंस्यसे (√सम्-रम् लृट् म.पु. ) |
| वीतभयः | वीत (√वि-इ + क्त)–भय (१.१) |
| कृतार्थः | कृतार्थ (१.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पि | तु | र्नि | र्दे | शं | नि | य | मे | न | कृ | त्वा |
| व | ना | न्नि | वृ | त्त | श्च | रि | त | व्र | त | श्च |
| स्त्री | भि | स्तु | म | न्ये | वि | पु | ले | क्ष | णा | भिः |
| सं | रं | स्य | से | वी | त | भ | यः | कृ | ता | र्थः |