अहं तु राम त्वयि जातकामा; चिरं विनाशाय निबद्धभावा ।
मोघं चरित्वाथ तपोव्रतं च; त्यक्ष्यामि धिग्जीवितमल्पभाग्या ॥
अहं तु राम त्वयि जातकामा; चिरं विनाशाय निबद्धभावा ।
मोघं चरित्वाथ तपोव्रतं च; त्यक्ष्यामि धिग्जीवितमल्पभाग्या ॥
अन्वयः
राम Rama, त्वयि at you, जातकामा I loved, अहं तु I am also, विनाशाय for my doom, चिरम् for long, निबद्धभावा with my feeling of love fixed on you, तपः austerities, व्रतं च and vows, मोघम् in vain, चरित्वाथ after practising, जीवितम् life, त्यक्ष्यामि will be giving up, अल्पभाग्याम् I am unfortunate one, धिक् what a pityM N Dutt
(But for me) O Rama, I was for my own destruction, devoted, soul and heart, to you. Oh! fruitless is my asceticism and wifely virtue! Oh fie on me! I shall renounce this my unfortunate life.Summary
"O RamaI loved you and concentrated all my love on you for a long time only for my doom. I have observed vows and austerities in vain. I cannot continue it for long. Here I am giving up my life. Fie upon this luckless one (me).पदच्छेदः
| अहं | मद् (१.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| राम | राम (८.१) |
| त्वयि | त्वद् (७.१) |
| जातकामा | जात (√जन् + क्त)–काम (१.१) |
| चिरं | चिरम् (अव्ययः) |
| विनाशाय | विनाश (४.१) |
| निबद्धभावा | निबद्ध (√नि-बन्ध् + क्त)–भाव (१.१) |
| मोघं | मोघ (२.१) |
| चरित्वाथ | चरित्वा (√चर् + क्त्वा)–अथ (अव्ययः) |
| तपोव्रतं | तपस्–व्रत (२.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| त्यक्ष्यामि | त्यक्ष्यामि (√त्यज् लृट् उ.पु. ) |
| धिग् | धिक् (अव्ययः) |
| जीवितम् | जीवित (२.१) |
| अल्पभाग्या | अल्पभाग्य (१.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | हं | तु | रा | म | त्व | यि | जा | त | का | मा |
| चि | रं | वि | ना | शा | य | नि | ब | द्ध | भा | वा |
| मो | घं | च | रि | त्वा | थ | त | पो | व्र | तं | च |
| त्य | क्ष्या | मि | धि | ग्जी | वि | त | म | ल्प | भा | ग्या |