सत्यं बतेदं प्रवदन्ति लोके; नाकालमृत्युर्भवतीति सन्तः ।
यत्राहमेवं परिभर्त्स्यमाना; जीवामि किंचित्क्षणमप्यपुण्या ॥
सत्यं बतेदं प्रवदन्ति लोके; नाकालमृत्युर्भवतीति सन्तः ।
यत्राहमेवं परिभर्त्स्यमाना; जीवामि किंचित्क्षणमप्यपुण्या ॥
अन्वयः
लोके in the world, अकालमृत्युः untimely death, न भवति does not occur, इति like this, इदम् thus, सत्यम् true, सन्तः elders, प्रवदन्ति say, यत्र wherever, एवम् this way, परिभर्त्स्यमाना being threatened, अपुण्या who lacks merits, अहम् I am, दीना pitiable, क्षणमपि even a second also, जीवामि I live, बत alas.M N Dutt
Truly the sages say that death in this world dose not come untimely. Or else would I have, vicious as I am, lived for a moment, being thus sorely threatened.Summary
"Even though I am threatened like this, I am living pitiably because of lack of merit. Indeed I regret my survival due to my bad luck. Elders say that death will not ocurr before its time. It seems to be true.पदच्छेदः
| सत्यं | सत्य (२.१) |
| बतेदं | बत (अव्ययः)–इदम् (२.१) |
| प्रवदन्ति | प्रवदन्ति (√प्र-वद् लट् प्र.पु. बहु.) |
| लोके | लोक (७.१) |
| नाकालमृत्युर् | न (अव्ययः)–अकाल–मृत्यु (१.१) |
| भवतीति | भवति (√भू लट् प्र.पु. एक.)–इति (अव्ययः) |
| सन्तः | सत् (√अस् + शतृ, १.३) |
| यत्राहम् | यत्र (अव्ययः)–मद् (१.१) |
| एवं | एवम् (अव्ययः) |
| परिभर्त्स्यमाना | परिभर्त्स्यमान (√परि-भर्त्स् + शानच्, १.१) |
| जीवामि | जीवामि (√जीव् लट् उ.पु. ) |
| किंचित् | कश्चित् (२.१) |
| क्षणम् | क्षण (२.१) |
| अप्यपुण्या | अपि (अव्ययः)–अपुण्य (१.१) |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | त्यं | ब | ते | दं | प्र | व | द | न्ति | लो | के |
| ना | का | ल | मृ | त्यु | र्भ | व | ती | ति | स | न्तः |
| य | त्रा | ह | मे | वं | प | रि | भ | र्त्स्य | मा | ना |
| जी | वा | मि | किं | चि | त्क्ष | ण | म | प्य | पु | ण्या |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||