भुजश्च चार्वञ्चितपीनवृत्तः; परार्ध्य कालागुरुचन्दनार्हः ।
अनुत्तमेनाध्युषितः प्रियेण; चिरेण वामः समवेपताशु ॥
भुजश्च चार्वञ्चितपीनवृत्तः; परार्ध्य कालागुरुचन्दनार्हः ।
अनुत्तमेनाध्युषितः प्रियेण; चिरेण वामः समवेपताशु ॥
अन्वयः
चार्वञ्चितपीनवृत्तः beautifuly curved round and stout, परार्थ्यकालागरुचन्दनार्हः deserving the application of excellent black agaru and sandal paste, अनुत्तमेन by the best, प्रियेण by the beloved, चिरेण for long, अध्युषितः used to rest the head, वामः भुजश्च by the left arm, आशु suddenly, समवेपत throbbed.M N Dutt
And her beautiful, round, plump left hand, which, ere this, sprinkled with costly aguru and sandal, used to serve for a pillow to Rāma, began to dance now again and again after a long time.Summary
Her stout left arm curved beautifully, fit for excellent agaru and sandal paste once the pillow by her beloved lord for long, throbbed suddenly.पदच्छेदः
| भुजश्च | भुज (१.१)–च (अव्ययः) |
| चार्वञ्चितपीनवृत्तः | चारु–अञ्चित (√अञ्चय् + क्त)–पीन–वृत्त (१.१) |
| परार्ध्यकालागुरुचन्दनार्हः | परार्ध्य–कालागुरु–चन्दन (१.१)–अर्ह (१.१) |
| अनुत्तमेनाध्युषितः | अनुत्तम (३.१)–अध्युषित (√अधि-वस् + क्त, १.१) |
| प्रियेण | प्रिय (३.१) |
| चिरेण | चिर (३.१) |
| वामः | वाम (१.१) |
| समवेपताशु | समवेपत (√सम्-विप् लङ् प्र.पु. एक.)–आशु (२.१) |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भु | ज | श्च | चा | र्व | ञ्चि | त | पी | न | वृ | त्तः |
| प | रा | र्ध्य | का | ला | गु | रु | च | न्द | ना | र्हः |
| अ | नु | त्त | मे | ना | ध्यु | षि | तः | प्रि | ये | ण |
| चि | रे | ण | वा | मः | स | म | वे | प | ता | शु |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||