सा तं समीक्ष्यैव भृशं विसंज्ञा; गतासुकल्पेव बभूव सीता ।
चिरेण संज्ञां प्रतिलभ्य चैव; विचिन्तयामास विशालनेत्रा ॥
सा तं समीक्ष्यैव भृशं विसंज्ञा; गतासुकल्पेव बभूव सीता ।
चिरेण संज्ञां प्रतिलभ्य चैव; विचिन्तयामास विशालनेत्रा ॥
अन्वयः
सा सीता that Sita, तम् him, समीक्ष्यैव after looking at, भृशम् greatly, विसंज्ञा lost senses, गतासुकल्पेव as if she was almost dead, बभूव remained, विशालनेत्रा largeeyed, चिरेण after a long time, संज्ञाम् senses, प्रतिलभ्य after getting back, भूयः again, विचिन्तयामास started thinkingM N Dutt
And beholding him Sītā was almost out of breath with fear. And regaining soon her sense the large-eyed damsel again thought.Summary
The largeeyed Sita lost her senses looking at him. She got back her senses after a long time and started thinking again:पदच्छेदः
| सा | तद् (१.१) |
| तं | तद् (२.१) |
| समीक्ष्यैव | समीक्ष्य (√सम्-ईक्ष् + ल्यप्)–एव (अव्ययः) |
| भृशं | भृशम् (अव्ययः) |
| विसंज्ञा | विसंज्ञ (१.१) |
| गतासुकल्पेव | गतासु–कल्प (१.१)–इव (अव्ययः) |
| बभूव | बभूव (√भू लिट् प्र.पु. एक.) |
| सीता | सीता (१.१) |
| चिरेण | चिर (३.१) |
| संज्ञां | संज्ञा (२.१) |
| प्रतिलभ्य | प्रतिलभ्य (√प्रति-लभ् + ल्यप्) |
| चैव | च (अव्ययः)–एव (अव्ययः) |
| विचिन्तयामास | विचिन्तयामास (√वि-चिन्तय् प्र.पु. एक.) |
| विशालनेत्रा | विशाल–नेत्र (१.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सा | तं | स | मी | क्ष्यै | व | भृ | शं | वि | सं | ज्ञा |
| ग | ता | सु | क | ल्पे | व | ब | भू | व | सी | ता |
| चि | रे | ण | सं | ज्ञां | प्र | ति | ल | भ्य | चै | व |
| वि | चि | न्त | या | मा | स | वि | शा | ल | ने | त्रा |