अप्रावृताः काञ्चनराजिवर्णाः; काश्चित्परार्ध्यास्तपनीयवर्णाः ।
पुनश्च काश्चिच्छशलक्ष्मवर्णाः; कान्तप्रहीणा रुचिराङ्गवर्णाः ॥
अप्रावृताः काञ्चनराजिवर्णाः; काश्चित्परार्ध्यास्तपनीयवर्णाः ।
पुनश्च काश्चिच्छशलक्ष्मवर्णाः; कान्तप्रहीणा रुचिराङ्गवर्णाः ॥
अन्वयः
अप्रावृताः without any veil, काञ्चनराजिवर्णाः of golden hue,परार्थ्याः altruistic demonesses, तपनीयवर्णाः shining with polished gold, काश्चित् a few, पुनश्च again, शशलक्ष्मवर्णाः pale white like the colour of Moon, काश्चित् a few, रुचिराङ्गवर्णाः of attractive complexion, कान्तप्रहीणाः separated from their husbands.M N Dutt
Hanumān saw some without sheets, like to golden streaks, paragons among women of the hue of molten gold, and some of a moon-like complexion, endued with lovelines, bereft of their beloved.Summary
Ogresses without veil, some altruistic, some separated from their husbands looked pale like the Moon, though possessed of polished gold complexion.पदच्छेदः
| अप्रावृताः | अप्रावृत (२.३) |
| काञ्चनराजिवर्णाः | काञ्चन–राजि–वर्ण (२.३) |
| काश्चित् | कश्चित् (२.३) |
| परार्ध्यास्तपनीयवर्णाः | परार्ध्य (२.३)–तपनीय–वर्ण (२.३) |
| पुनश्च | पुनर् (अव्ययः)–च (अव्ययः) |
| काश्चिच्छशलक्ष्मवर्णाः | कश्चित् (२.३)–शशलक्ष्मन्–वर्ण (२.३) |
| कान्तप्रहीणा | कान्त–प्रहीण (√प्र-हा + क्त, २.३) |
| रुचिराङ्गवर्णाः | रुचिर–अङ्ग–वर्ण (२.३) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | प्रा | वृ | ताः | का | ञ्च | न | रा | जि | व | र्णाः |
| का | श्चि | त्प | रा | र्ध्या | स्त | प | नी | य | व | र्णाः |
| पु | न | श्च | का | श्चि | च्छ | श | ल | क्ष्म | व | र्णाः |
| का | न्त | प्र | ही | णा | रु | चि | रा | ङ्ग | व | र्णाः |