५.४.२२

उष्णार्दितां सानुसृतास्रकण्ठीं; पुरा वरार्होत्तमनिष्ककण्ठीम् ।
सुजातपक्ष्मामभिरक्तकण्ठीं; वने प्रवृत्तामिव नीलकण्ठीम् ॥

अन्वयः

उष्णार्दिताम् shedding hot tears, सानुसृतास्रकण्ठीम् with her throat choked with incessant tears, पुरा earlier, वरार्होत्तमनिष्ककण्ठीम् wearing costly ornaments on the neck, सुजातपक्ष्माम् who has beautiful eyelashes, अभिरक्तकण्ठीम् a woman of sweet, loving voice, वने in the forest, अप्रवृत्ताम् wandering, नीलकण्ठीमिव like a peahen.

Summary

She whose neck was adorned with costly ornaments earlier must be shedding hot tears now, her throat choked with grief. With her beautiful eyelashes and a sweet loving voice, she would be now like a peahen wandering in the woods.

पदच्छेदः

उष्णार्दितांउष्ण–अर्दित (√अर्दय् + क्त, २.१)
सानुसृतास्रकण्ठीं (अव्ययः)–अनुसृत (√अनु-सृ + क्त)–अस्र–कण्ठी (२.१)
पुरापुरा (अव्ययः)
वरार्होत्तमनिष्ककण्ठीम्वरार्ह–उत्तम–निष्क–कण्ठी (२.१)
सुजातपक्ष्माम्सुजात–पक्ष्म (२.१)
अभिरक्तकण्ठींअभिरक्त (√अभि-रञ्ज् + क्त)–कण्ठी (२.१)
वनेवन (७.१)
प्रवृत्ताम्प्रवृत्त (√प्र-वृत् + क्त, २.१)
इवइव (अव्ययः)
नीलकण्ठीम्नीलकण्ठी (२.१)

छन्दः

उपजातिः [११]

छन्दोविश्लेषणम्

१०११
ष्णार्दि तां सानुसृ तास्र ण्ठीं
पु रा रा र्होत्त निष्क ण्ठीम्
सु जा क्ष्माभिक्त ण्ठीं
नेप्र वृ त्तामि नी ण्ठीम्