सीतामपश्यन्मनुजेश्वरस्य; रामस्य पत्नीं वदतां वरस्य ।
बभूव दुःखाभिहतश्चिरस्य; प्लवंगमो मन्द इवाचिरस्य ॥
सीतामपश्यन्मनुजेश्वरस्य; रामस्य पत्नीं वदतां वरस्य ।
बभूव दुःखाभिहतश्चिरस्य; प्लवंगमो मन्द इवाचिरस्य ॥
अन्वयः
प्लवङ्गमः monkey, वदताम् among those who are good at speech, वरस्य of the best ones, मनुजेश्वरस्य of the lord of men, रामस्य Rama's, पत्नीम् wife, सीताम् Sta, चिरस्य for a short while, अपश्यन् not able to find, दुःखाभिहितः hit by grief, अचिरस्य for a while, मन्दः इव as though dull, बभूव became.Summary
Hanuman stood griefstricken, having (unsuccessfully) searched for a long time for the wife of Rama, the lord of men. The highly eloquent was now despondent. For a while he looked dull and dejected.इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चमस्सर्गः॥Thus ends the fifth sarga of Sundarakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| सीताम् | सीता (२.१) |
| अपश्यन्मनुजेश्वरस्य | अपश्यत् (१.१)–मनुज–ईश्वर (६.१) |
| रामस्य | राम (६.१) |
| पत्नीं | पत्नी (२.१) |
| वदतां | वदत् (√वद् + शतृ, ६.३) |
| वरस्य | वर (६.१) |
| बभूव | बभूव (√भू लिट् प्र.पु. एक.) |
| दुःखाभिहतश्चिरस्य | दुःख–अभिहत (√अभि-हन् + क्त, १.१)–चिर (६.१) |
| प्लवंगमो | प्लवंगम (१.१) |
| मन्द | मन्द (१.१) |
| इवाचिरस्य | इव (अव्ययः)–अचिर (६.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सी | ता | म | प | श्य | न्म | नु | जे | श्व | र | स्य |
| रा | म | स्य | प | त्नीं | व | द | तां | व | र | स्य |
| ब | भू | व | दुः | खा | भि | ह | त | श्चि | र | स्य |
| प्ल | वं | ग | मो | म | न्द | इ | वा | चि | र | स्य |