पराक्रमोत्साहविवृद्धमानसः; समीक्षते मां प्रमुखागतः स्थितः ।
पराक्रमो ह्यस्य मनांसि कम्पये;त्सुरासुराणामपि शीघ्रकारिणः ॥
पराक्रमोत्साहविवृद्धमानसः; समीक्षते मां प्रमुखागतः स्थितः ।
पराक्रमो ह्यस्य मनांसि कम्पये;त्सुरासुराणामपि शीघ्रकारिणः ॥
अन्वयः
पराक्रमोत्साहविवृद्धमानसः mental horizon is expanding with his valour and power, प्रमुखाग्रतः facing me, स्थितः stood, माम् me, समीक्षते he is looking, शीघ्रगामिनः of a swift warrior, अस्य his, पराक्रमः valour, सुरासुराणाम् for suras and asuras, मनांसि अपि minds also, प्रकम्पयेत् will shakeM N Dutt
With his mind braced by prowess and hope, that foremost of heroes eye me staying in the fore-front. The prowess of this light-handed (one), I were, make even the hearts of the celestials and Asuras tremble.Summary
'His mental horizon is enhanced by his valour and power. He is standing before me and dares to look into my eyes. Surely his swift movement and valour will shake even the minds of suras and asuras.पदच्छेदः
| पराक्रमोत्साहविवृद्धमानसः | पराक्रम–उत्साह–विवृद्ध (√वि-वृध् + क्त)–मानस (१.१) |
| समीक्षते | समीक्षते (√सम्-ईक्ष् लट् प्र.पु. एक.) |
| मां | मद् (२.१) |
| प्रमुखागतः | प्रमुख–आगत (√आ-गम् + क्त, १.१) |
| स्थितः | स्थित (√स्था + क्त, १.१) |
| पराक्रमो | पराक्रम (१.१) |
| ह्यस्य | हि (अव्ययः)–इदम् (६.१) |
| मनांसि | मनस् (२.३) |
| कम्पयेत् | कम्पयेत् (√कम्पय् विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| सुरासुराणाम् | सुर–असुर (६.३) |
| अपि | अपि (अव्ययः) |
| शीघ्रकारिणः | शीघ्र–कारिन् (६.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | रा | क्र | मो | त्सा | ह | वि | वृ | द्ध | मा | न | सः |
| स | मी | क्ष | ते | मां | प्र | मु | खा | ग | तः | स्थि | तः |
| प | रा | क्र | मो | ह्य | स्य | म | नां | सि | क | म्प | ये |
| त्सु | रा | सु | रा | णा | म | पि | शी | घ्र | का | रि | णः |
| ज | त | ज | र | ||||||||