ततः कपिस्तं विचरन्तमम्बरे; पतत्रिराजानिलसिद्धसेविते ।
समेत्य तं मारुतवेगविक्रमः; क्रमेण जग्राह च पादयोर्दृढम् ॥
ततः कपिस्तं विचरन्तमम्बरे; पतत्रिराजानिलसिद्धसेविते ।
समेत्य तं मारुतवेगविक्रमः; क्रमेण जग्राह च पादयोर्दृढम् ॥
अन्वयः
ततः then, मारुततुल्यविक्रमः equal to wind in prowess, कपिः Hanuman, पतत्रिराजानिलसिद्धसेविते in the flying abode of Garuda, Wind and the Siddhas, अम्बरे in the sky, विचरन्तम् while flying, तम् him, समेत्य reached, क्रमेण gradually, तम् him, पादयोः by both his legs, दृढम् firmly, जग्राह caughtM N Dutt
Then the monkey possessed of the energy and vigour of the Wind, approaching him as he was ranging the air coursed by the king of birds, the Wind and the Siddhas, at length fast caught hold of his legs.Summary
Thereupon Hanuman with the prowess that was equal to wind, approaching the sky firmly caught hold of the legs of Aksha flying into the abode of Garuda, the Windgod and the Siddhas.पदच्छेदः
| ततः | ततस् (अव्ययः) |
| कपिस्तं | कपि (१.१)–तद् (२.१) |
| विचरन्तम् | विचरत् (√वि-चर् + शतृ, २.१) |
| अम्बरे | अम्बर (७.१) |
| पतत्रिराजानिलसिद्धसेविते | पतत्रिन्–राजन्–अनिल–सिद्ध–सेवित (√सेव् + क्त, ७.१) |
| समेत्य | समेत्य (√समा-इ + ल्यप्) |
| तं | तद् (२.१) |
| मारुतवेगविक्रमः | मारुत–वेग–विक्रम (१.१) |
| क्रमेण | क्रमेण (अव्ययः) |
| जग्राह | जग्राह (√ग्रह् लिट् प्र.पु. एक.) |
| च | च (अव्ययः) |
| पादयोर् | पाद (७.२) |
| दृढम् | दृढम् (अव्ययः) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तः | क | पि | स्तं | वि | च | र | न्त | म | म्ब | रे |
| प | त | त्रि | रा | जा | नि | ल | सि | द्ध | से | वि | ते |
| स | मे | त्य | तं | मा | रु | त | वे | ग | वि | क्र | मः |
| क्र | मे | ण | ज | ग्रा | ह | च | पा | द | यो | र्दृ | ढम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||