तस्मिंस्ततः संयति जातहर्षे; रणाय निर्गच्छति बाणपाणौ ।
दिशश्च सर्वाः कलुषा बभूवु;र्मृगाश्च रौद्रा बहुधा विनेदुः ॥
तस्मिंस्ततः संयति जातहर्षे; रणाय निर्गच्छति बाणपाणौ ।
दिशश्च सर्वाः कलुषा बभूवु;र्मृगाश्च रौद्रा बहुधा विनेदुः ॥
अन्वयः
ततः then, संयति for war, जातहर्षे feeling happy, तस्मिन् with him, चापपाणौ when he held bow in his hand, रणाय for war, निर्गच्छति was going forth, सर्वाः all, दिशः quarters, कलुषाः gloomy, बभूवुः, appeared रौद्राः wild, मृगाश्च animals, बहुधा in various ways, विनेदुः howledM N Dutt
And as he issued out for battle, greatly delighted, with arrows in his hands, all the quar'ers becai.e dark, and jackals began to set up terrible cries.Summary
When he sallied forth happily holding a bow full of passion for war, darkness prevailed in all quarters and it became gloomy. Beasts began to howl in various frightful ways.पदच्छेदः
| तस्मिंस्ततः | तद् (७.१)–ततस् (अव्ययः) |
| संयति | संयत् (७.१) |
| जातहर्षे | जात (√जन् + क्त)–हर्ष (७.१) |
| रणाय | रण (४.१) |
| निर्गच्छति | निर्गच्छत् (√निः-गम् + शतृ, ७.१) |
| बाणपाणौ | बाण–पाणि (७.१) |
| दिशश्च | दिश् (१.३)–च (अव्ययः) |
| सर्वाः | सर्व (१.३) |
| कलुषा | कलुष (१.३) |
| बभूवुर् | बभूवुः (√भू लिट् प्र.पु. बहु.) |
| मृगाश्च | मृग (१.३)–च (अव्ययः) |
| रौद्रा | रौद्र (१.३) |
| बहुधा | बहुधा (अव्ययः) |
| विनेदुः | विनेदुः (√वि-नद् लिट् प्र.पु. बहु.) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | स्मिं | स्त | तः | सं | य | ति | जा | त | ह | र्षे |
| र | णा | य | नि | र्ग | च्छ | ति | बा | ण | पा | णौ |
| दि | श | श्च | स | र्वाः | क | लु | षा | ब | भू | वु |
| र्मृ | गा | श्च | रौ | द्रा | ब | हु | धा | वि | ने | दुः |