ततः शरानायततीक्ष्णशल्या;न्सुपत्रिणः काञ्चनचित्रपुङ्खान् ।
मुमोच वीरः परवीरहन्ता; सुसंततान्वज्रनिपातवेगान् ॥
ततः शरानायततीक्ष्णशल्या;न्सुपत्रिणः काञ्चनचित्रपुङ्खान् ।
मुमोच वीरः परवीरहन्ता; सुसंततान्वज्रनिपातवेगान् ॥
अन्वयः
ततः then, परवीरहन्ता a slayer of enemy warriors, वीरः hero, आयततीक्षणशल्यान् long and sharppointed arrows, सुपत्रिणः with fine feathers, काञ्चनचित्रपुङ्स्वा with gold tips touching the bowstring, सुसन्नतान् a little bent at the tips, वज्रनिपातवेगान् which had the speed of lightning, शरान् arrows, मुमोच dischargedM N Dutt
Thereupon the heroic (Indrajit)-slayer of foes-began to discharge incessantly shafts, large, sharp, well-feathered, painted in gold and swift-coursing like to thunder.Summary
Then the heroic Indrajit, slayer of enemy warriors, discharged long arrows that were fixed with find feathers with sharppointed gold tips, bent a little at the tip touching the bow string, as swift as lightning.पदच्छेदः
| ततः | ततस् (अव्ययः) |
| शरान् | शर (२.३) |
| आयततीक्ष्णशल्यान् | आयत (√आ-यम् + क्त)–तीक्ष्ण–शल्य (२.३) |
| सुपत्रिणः | सुपत्त्रिन् (२.३) |
| काञ्चनचित्रपुङ्खान् | काञ्चन–चित्र–पुङ्ख (२.३) |
| मुमोच | मुमोच (√मुच् लिट् प्र.पु. एक.) |
| वीरः | वीर (१.१) |
| परवीरहन्ता | पर–वीर (८.१)–हन्तृ (१.१) |
| सुसंततान् | सुसंतत (२.३) |
| वज्रनिपातवेगान् | वज्र–निपात–वेग (२.३) |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तः | श | रा | ना | य | त | ती | क्ष्ण | श | ल्या |
| न्सु | प | त्रि | णः | का | ञ्च | न | चि | त्र | पु | ङ्खान् |
| मु | मो | च | वी | रः | प | र | वी | र | ह | न्ता |
| सु | सं | त | ता | न्व | ज्र | नि | पा | त | वे | गान् |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||