स रोचयामास परैश्च बन्धनं; प्रसह्य वीरैरभिनिग्रहं च ।
कौतूहलान्मां यदि राक्षसेन्द्रो; द्रष्टुं व्यवस्येदिति निश्चितार्थः ॥
स रोचयामास परैश्च बन्धनं; प्रसह्य वीरैरभिनिग्रहं च ।
कौतूहलान्मां यदि राक्षसेन्द्रो; द्रष्टुं व्यवस्येदिति निश्चितार्थः ॥
अन्वयः
राक्षसेन्द्रः demon king, माम् me, कौतूहलात् out of curiosity, द्रष्टुम् to see, व्यवस्येद्यदि if he decides, इति this way, निश्चितार्थः decided, सः he परै: by the enemies, बन्धनम bondage, वीरैः by warriors, प्रसह्य by force, अभिनिग्रहं च even capture also, रोचयामास enjoyedM N Dutt
And he gladly allowed himself to be tied up and rebuked by his enemies, thinking that he might converse with the lord of the Rākşasas, if he, out of curiosity, should like to see him.Summary
Bound by the enemy warriors, Hanuman, decided to bear all humiliations, thinking, 'May be the demon king might come to see me out of curiosity if he is so disposed'.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| रोचयामास | रोचयामास (√रोचय् प्र.पु. एक.) |
| परैश्च | पर (३.३)–च (अव्ययः) |
| बन्धनं | बन्धन (२.१) |
| प्रसह्य | प्रसह्य (√प्र-सह् + ल्यप्) |
| वीरैर् | वीर (३.३) |
| अभिनिग्रहं | अभिनिग्रह (२.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| कौतूहलान्मां | कौतूहल (५.१)–मद् (२.१) |
| यदि | यदि (अव्ययः) |
| राक्षसेन्द्रो | राक्षस–इन्द्र (१.१) |
| द्रष्टुं | द्रष्टुम् (√दृश् + तुमुन्) |
| व्यवस्येद् | व्यवस्येत् (√व्यव-सा विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| इति | इति (अव्ययः) |
| निश्चितार्थः | निश्चित (√निः-चि + क्त)–अर्थ (१.१) |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | रो | च | या | मा | स | प | रै | श्च | ब | न्ध | नं |
| प्र | स | ह्य | वी | रै | र | भि | नि | ग्र | हं | च | |
| कौ | तू | ह | ला | न्मां | य | दि | रा | क्ष | से | न्द्रो | |
| द्र | ष्टुं | व्य | व | स्ये | दि | ति | नि | श्चि | ता | र्थः | |
| त | त | ज | ग | ग | |||||||