अहं तु हनुमान्नाम मारुतस्यौरसः सुतः ।
सीतायास्तु कृते तूर्णं शतयोजनमायतम् ।
समुद्रं लङ्घयित्वैव तां दिदृक्षुरिहागतः ॥
अहं तु हनुमान्नाम मारुतस्यौरसः सुतः ।
सीतायास्तु कृते तूर्णं शतयोजनमायतम् ।
समुद्रं लङ्घयित्वैव तां दिदृक्षुरिहागतः ॥
अन्वयः
मारुतस्य Maruta's, औरसः सुतः own son, हनुमान्नाम Hanuman by name, अहं तु I too, सीतायाः कृते for Sita, तूर्णम् swiftly, शतयोजनम् a hundred yojanas, आयतम् broad, समुद्रम् ocean, लङ्घयित्वैव leaping, ताम् her, दिदृक्षुः desirous of seeing, इह here, आगतः came.M N Dutt
I, Hanumān my name, am the son of the Wind-god. For Sitã, I, desirous of seeing her, have come hither, bounding over the main measuring a full hundred Yojanas. And as I was roving, I came to see Janaka's daughter in your house.Summary
"I, Maruta's son, Hanuman by name too came swiftly leaping across a hundred yojanas across the ocean searching for Sita.पदच्छेदः
| अहं | मद् (१.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| हनुमान्नाम | हनुमन्त् (१.१)–नाम (अव्ययः) |
| मारुतस्यौरसः | मारुत (६.१)–औरस (१.१) |
| सुतः | सुत (१.१) |
| सीतायास्तु | सीता (६.१)–तु (अव्ययः) |
| कृते | कृत (७.१) |
| तूर्णं | तूर्णम् (अव्ययः) |
| शतयोजनम् | शत–योजन (२.१) |
| आयतम् | आयत (√आ-यम् + क्त, २.१) |
| समुद्रं | समुद्र (२.१) |
| लङ्घयित्वैव | लङ्घयित्वा (√लङ्घय् + क्त्वा)–एव (अव्ययः) |
| तां | तद् (२.१) |
| दिदृक्षुर् | दिदृक्षु (१.१) |
| इहागतः | इह (अव्ययः)–आगत (√आ-गम् + क्त, १.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | हं | तु | ह | नु | मा | न्ना | म | मा | रु | त | स्यौ |
| र | सः | सु | तः | सी | ता | या | स्तु | कृ | ते | तू | र्णं |
| श | त | यो | ज | न | मा | य | तम् | स | मु | द्रं | ल |
| ङ्घ | यि | त्वै | व | तां | दि | दृ | क्षु | रि | हा | ग | तः |