लङ्का चरयितव्या मे पुनरेव भवेदिति ।
रात्रौ न हि सुदृष्टा मे दुर्गकर्मविधानतः ।
अवश्यमेव द्रष्टव्या मया लङ्का निशाक्षये ॥
लङ्का चरयितव्या मे पुनरेव भवेदिति ।
रात्रौ न हि सुदृष्टा मे दुर्गकर्मविधानतः ।
अवश्यमेव द्रष्टव्या मया लङ्का निशाक्षये ॥
अन्वयः
लङ्का Lanka, दुर्गकर्मविधानतः acquiring knowledge of the fortification of the city, रात्रौ in the night, सुदृष्टा well observed, न हि not indeed, निशाक्षये at the end of the night, मया by me, अवश्यमेव surely, द्रष्टव्या should be seen.M N Dutt
I shall once more range around Lankā. Let this be so. At night I could not satisfactorily examine the fortifications.* (Another meaning is:-lts places inaccessible on account of works.)Summary
'Indeed I saw Lanka at night for which I could not acquire proper knowledge about the fortification of the city. Surely it should be seen by me now after the night has passed.पदच्छेदः
| लङ्का | लङ्का (१.१) |
| चारयितव्या | चारयितव्य (√चारय् + कृत्, १.१) |
| मे | मद् (६.१) |
| पुनर् | पुनर् (अव्ययः) |
| एव | एव (अव्ययः) |
| भवेद् | भवेत् (√भू विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| इति | इति (अव्ययः) |
| रात्रौ | रात्रि (७.१) |
| न | न (अव्ययः) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| सुदृष्टा | सु (अव्ययः)–दृष्ट (√दृश् + क्त, १.१) |
| मे | मद् (६.१) |
| दुर्गकर्मविधानतः | दुर्ग–कर्मन्–विधान (५.१) |
| अवश्यम् | अवश्यम् (अव्ययः) |
| एव | एव (अव्ययः) |
| द्रष्टव्या | द्रष्टव्य (√दृश् + कृत्, १.१) |
| मया | मद् (३.१) |
| लङ्का | लङ्का (१.१) |
| निशाक्षये | निशा–क्षय (७.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ल | ङ्का | च | र | यि | त | व्या | मे | पु | न | रे | व |
| भ | वे | दि | ति | रा | त्रौ | न | हि | सु | दृ | ष्टा | मे |
| दु | र्ग | क | र्म | वि | धा | न | तः | अ | व | श्य | मे |
| व | द्र | ष्ट | व्या | म | या | ल | ङ्का | नि | शा | क्ष | ये |