अन्वयः
श्रीमान् illustrious, विमुक्तश्च relieved of bondage, पुनः again, पर्वतसन्निभः grew like a mountain, अभवत् became, वीक्षमाणश्च looking around, तोरणाश्रितम् near the archway, परिघम् iron club, ददृशे saw.
Summary
Illustrious Hanuman was relieved of the bond and once again grew to a mountain size. Looking around he saw an iron club near the archway.
पदच्छेदः
| विमुक्तश्चाभवच्छ्रीमान् | विमुक्त (√वि-मुच् + क्त, १.१)–च (अव्ययः)–अभवत् (√भू लङ् प्र.पु. एक.)–श्रीमत् (१.१) |
| पुनः | पुनर् (अव्ययः) |
| पर्वतसंनिभः | पर्वत–संनिभ (१.१) |
| वीक्षमाणश्च | वीक्षमाण (√वि-ईक्ष् + शानच्, १.१)–च (अव्ययः) |
| ददृशे | ददृशे (√दृश् लिट् प्र.पु. एक.) |
| परिघं | परिघ (२.१) |
| तोरणाश्रितम् | तोरण–आश्रित (√आ-श्रि + क्त, २.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| वि | मु | क्त | श्चा | भ | व | च्छ्री | मा |
| न्पु | नः | प | र्व | त | सं | नि | भः |
| वी | क्ष | मा | ण | श्च | द | दृ | शे |
| प | रि | घं | तो | र | णा | श्रि | तम् |