स तान्निहत्वा रणचण्डविक्रमः; समीक्षमाणः पुनरेव लङ्काम् ।
प्रदीप्तलाङ्गूलकृतार्चिमाली; प्रकाशतादित्य इवांशुमाली ॥
स तान्निहत्वा रणचण्डविक्रमः; समीक्षमाणः पुनरेव लङ्काम् ।
प्रदीप्तलाङ्गूलकृतार्चिमाली; प्रकाशतादित्य इवांशुमाली ॥
अन्वयः
रणचण्डविक्रमः of fearsome valour in war, सः he, तान् those, निहत्त्वा having killed, पुनरेव once again, लङ्काम् at Lanka, समीक्षमाणः while gazing, प्रदीप्तलाङ्गूलकृतार्चिमाली garlanded by the flames of his tail, अर्चिमाली garlanded by rays, आदित्य इव just like Sun, प्रकाशत shining.M N Dutt
Having slain the warders, that one of terrific prowess crowned with a luminous wreath forged from his flaming tail, and appearing like the sun garlanded with glory, once again cast his eyes over Lanka.Summary
Hanuman, who was of fearsome valour in war with the demons, having killed them, gazed at Lanka once again. Garlanded by the flames of his tail around, he shone like the Sun covered with garlands of rays. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रिपञ्चाशस्सर्गः॥Thus ends the fiftythird sarga of Sundarakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| तान्निहत्वा | तद् (२.३)–निहत्वा (√नि-हन् + ल्यप्) |
| रणचण्डविक्रमः | रण–चण्ड–विक्रम (१.१) |
| समीक्षमाणः | समीक्षमाण (√सम्-ईक्ष् + शानच्, १.१) |
| पुनर् | पुनर् (अव्ययः) |
| एव | एव (अव्ययः) |
| लङ्काम् | लङ्का (२.१) |
| प्रदीप्तलाङ्गूलकृतार्चिमाली | प्रदीप्त (√प्र-दीप् + क्त)–लाङ्गूल–कृत (√कृ + क्त)–अर्चि–मालिन् (१.१) |
| प्रकाशतादित्य | प्रकाशत (√प्र-काश् लङ् प्र.पु. एक.)–आदित्य (१.१) |
| इवांशुमाली | इव (अव्ययः)–अंशुमालिन् (१.१) |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | ता | न्नि | ह | त्वा | र | ण | च | ण्ड | वि | क्र | मः |
| स | मी | क्ष | मा | णः | पु | न | रे | व | ल | ङ्काम् | |
| प्र | दी | प्त | ला | ङ्गू | ल | कृ | ता | र्चि | मा | ली | |
| प्र | का | श | ता | दि | त्य | इ | वां | शु | मा | ली | |
| ज | त | ज | ग | ग | |||||||