नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां तृणानां च यथा तथा ।
हनूमान्राक्षसेन्द्राणां वधे किंचिन्न तृप्यति ॥
नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां तृणानां च यथा तथा ।
हनूमान्राक्षसेन्द्राणां वधे किंचिन्न तृप्यति ॥
अन्वयः
अग्निः fire, काष्ठानाम् with dry logs, तृणानाम् blades of grass, न तृप्यति is not satisfied, राक्षसेन्द्राणाम् of demon kings, विशस्तानाम् dead ones, न तृप्यति is not satisfied.M N Dutt
And as Fire is not cloyed with wood and straw, Hanumān never at all felt satiety on slaying those foremost of Räkşasas. And the Earth could not contain the Rākşasas slain by Hanumăn.Summary
Just as fire is not satisfied with dry sticks and grass Hanuman was not satisfied with the dead demons.पदच्छेदः
| नाग्निस्तृप्यति | न (अव्ययः)–अग्नि (१.१)–तृप्यति (√तृप् लट् प्र.पु. एक.) |
| काष्ठानां | काष्ठ (६.३) |
| तृणानां | तृण (६.३) |
| च | च (अव्ययः) |
| यथा | यथा (अव्ययः) |
| तथा | तथा (अव्ययः) |
| हनूमान् | हनुमन्त् (१.१) |
| राक्षसेन्द्राणां | राक्षस–इन्द्र (६.३) |
| वधे | वध (७.१) |
| किंचिन् | कश्चित् (२.१) |
| न | न (अव्ययः) |
| तृप्यति | तृप्यति (√तृप् लट् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ना | ग्नि | स्तृ | प्य | ति | का | ष्ठा | नां |
| तृ | णा | नां | च | य | था | त | था |
| ह | नू | मा | न्रा | क्ष | से | न्द्रा | णां |
| व | धे | किं | चि | न्न | तृ | प्य | ति |