स राक्षसांस्तान्सुबहूंश्च हत्वा; वनं च भङ्क्त्वा बहुपादपं तत् ।
विसृज्य रक्षो भवनेषु चाग्निं; जगाम रामं मनसा महात्मा ॥
स राक्षसांस्तान्सुबहूंश्च हत्वा; वनं च भङ्क्त्वा बहुपादपं तत् ।
विसृज्य रक्षो भवनेषु चाग्निं; जगाम रामं मनसा महात्मा ॥
अन्वयः
महात्मा a great self, सः he, सुबहून् many of them, तान् राक्षसान् the demons, हत्वा having killed, बहुपादपम् having many trees, तत् वनं च that garden also, भङ्क्त्वा after breaking, रक्षोभवनेषु in the mansions of demons, अग्निम् fire, विसृज्य after setting, मनसा in his mind, रामम् Rama, जगाम reached.M N Dutt
And destroying many a Rākṣasa, felling many trees in the forest and setting fire to the houses of the Raksasas, the high-souled (monkey) became engaged in thoughts touching Rāma.Summary
Great Hanuman, sought Rama's presence in his mind after killing many demons, breaking down many trees of the garden, and setting fire to the mansions of demons.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| राक्षसांस्तान् | राक्षस (२.३)–तद् (२.३) |
| सुबहूंश्च | सु (अव्ययः)–बहु (२.३)–च (अव्ययः) |
| हत्वा | हत्वा (√हन् + क्त्वा) |
| वनं | वन (२.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| भङ्क्त्वा | भङ्क्त्वा (√भञ्ज् + क्त्वा) |
| बहुपादपं | बहु–पादप (२.१) |
| तत् | तद् (२.१) |
| विसृज्य | विसृज्य (√वि-सृज् + ल्यप्) |
| रक्षोभवनेषु | रक्षस्–भवन (७.३) |
| चाग्निं | च (अव्ययः)–अग्नि (२.१) |
| जगाम | जगाम (√गम् लिट् प्र.पु. एक.) |
| रामं | राम (२.१) |
| मनसा | मनस् (३.१) |
| महात्मा | महात्मन् (१.१) |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | रा | क्ष | सां | स्ता | न्सु | ब | हूं | श्च | ह | त्वा |
| व | नं | च | भ | ङ्क्त्वा | ब | हु | पा | द | पं | तत् |
| वि | सृ | ज्य | र | क्षो | भ | व | ने | षु | चा | ग्निं |
| ज | गा | म | रा | मं | म | न | सा | म | हा | त्मा |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||