छाया मे निगृहीता च न च पश्यामि किंचन ।
सोऽहं विगतवेगस्तु दिशो दश विलोकयन् ।
न किंचित्तत्र पश्यामि येन मेऽपहृता गतिः ॥
छाया मे निगृहीता च न च पश्यामि किंचन ।
सोऽहं विगतवेगस्तु दिशो दश विलोकयन् ।
न किंचित्तत्र पश्यामि येन मेऽपहृता गतिः ॥
अन्वयः
मे my, छाया shadow, निगृहीता held, किञ्चन by some one, न च पश्यामि I could not see, विहतवेगः reduced my speed, सः अहम् I, दश दिशः all the ten directions, विलोकयन् looked around, येन even then, मे to me, गतिः one that approached, अपहृता that which seized, किञ्चित् not seen, तत्र न च पश्यामि was not seen.M N Dutt
And my velocity being deprived, I looked at the ten cardinal points; but I found there naught which could deprive me of my speed.Summary
"Then I was captured by a shadow of some one. I could not see and I reduced my speed and looked around in all the ten directions. I could not see the one who seized me.पदच्छेदः
| छाया | छाया (१.१) |
| मे | मद् (४.१) |
| निगृहीता | निगृहीत (√नि-ग्रह् + क्त, १.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| न | न (अव्ययः) |
| च | च (अव्ययः) |
| पश्यामि | पश्यामि (√पश् लट् उ.पु. ) |
| किंचन | कश्चन (२.१) |
| सो | तद् (१.१) |
| ऽहं | मद् (१.१) |
| विगतवेगस्तु | विगत (√वि-गम् + क्त)–वेग (१.१)–तु (अव्ययः) |
| दिशो | दिश् (२.३) |
| दश | दशन् (२.१) |
| विलोकयन् | विलोकयत् (√वि-लोकय् + शतृ, १.१) |
| न | न (अव्ययः) |
| किंचित् | कश्चित् (२.१) |
| तत्र | तत्र (अव्ययः) |
| पश्यामि | पश्यामि (√दृश् लट् उ.पु. ) |
| येन | यद् (३.१) |
| मे | मद् (६.१) |
| ऽपहृता | अपहृत (√अप-हृ + क्त, १.१) |
| गतिः | गति (१.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| छा | या | मे | नि | गृ | ही | ता | च | न | च | प | श्या |
| मि | किं | च | न | सो | ऽहं | वि | ग | त | वे | ग | स्तु |
| दि | शो | द | श | वि | लो | क | यन् | न | किं | चि | त्त |
| त्र | प | श्या | मि | ये | न | मे | ऽप | हृ | ता | ग | तिः |