स तैर्मदाच्चाप्रतिवार्य वेगै;र्बलाच्च तेनाप्रतिवार्यमाणैः ।
प्रधर्षितस्त्यक्तभयैः समेत्य; प्रकृष्यते चाप्यनवेक्ष्य दोषम् ॥
स तैर्मदाच्चाप्रतिवार्य वेगै;र्बलाच्च तेनाप्रतिवार्यमाणैः ।
प्रधर्षितस्त्यक्तभयैः समेत्य; प्रकृष्यते चाप्यनवेक्ष्य दोषम् ॥
अन्वयः
तैर्मदात् in their drunkenness, अप्रतिवार्यवाक्यैः speaking in abusive language, तेन by them, बलात् by their strength, प्रतिवार्यमाणैः retaliated, त्यक्तभयैः devoid of fear, तैः those, प्रधर्षितः roared, सः that, दोषं च mistakes only, अनवेक्ष्य not seeing, सम्ये held, प्रकृष्यते च pulled.M N Dutt
They were greatly excited with drink, and being prevented forcibly by Dadhimukha, they giving up all fear, began to pull him.Summary
In their drunkenness they were using abusive language and with their strength they retaliated without fear. They invaded without considering their mistakes. They caught hold of Dadhimukha and pulled him.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| तैर् | तद् (३.३) |
| मदाच्चाप्रतिवार्यवेगैर् | मद (५.१)–च (अव्ययः)–अप्रतिवार्य–वेग (३.३) |
| बलाच्च | बल (५.१)–च (अव्ययः) |
| तेनाप्रतिवार्यमाणैः | तद् (३.१)–अप्रतिवार्यमाण (३.३) |
| प्रधर्षितस्त्यक्तभयैः | प्रधर्षित (√प्र-धर्षय् + क्त, १.१)–त्यक्त (√त्यज् + क्त)–भय (३.३) |
| समेत्य | समेत्य (√समा-इ + ल्यप्) |
| प्रकृष्यते | प्रकृष्यते (√प्र-कृष् प्र.पु. एक.) |
| चाप्यनवेक्ष्य | च (अव्ययः)–अपि (अव्ययः)–अनवेक्ष्य (अव्ययः) |
| दोषम् | दोष (२.१) |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | तै | र्म | दा | च्चा | प्र | ति | वा | र्य | वे | गै |
| र्ब | ला | च्च | ते | ना | प्र | ति | वा | र्य | मा | णैः |
| प्र | ध | र्षि | त | स्त्य | क्त | भ | यैः | स | मे | त्य |
| प्र | कृ | ष्य | ते | चा | प्य | न | वे | क्ष्य | दो | षम् |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||