पुनश्च सोऽचिन्तयदार्तरूपो; ध्रुवं विशिष्टा गुणतो हि सीता ।
अथायमस्यां कृतवान्महात्मा; लङ्केश्वरः कष्टमनार्यकर्म ॥
पुनश्च सोऽचिन्तयदार्तरूपो; ध्रुवं विशिष्टा गुणतो हि सीता ।
अथायमस्यां कृतवान्महात्मा; लङ्केश्वरः कष्टमनार्यकर्म ॥
अन्वयः
सः he, आत्तरूपः assuming his true form, पुनश्च once again, अचिन्तयत् he thought, सीता Sita, ध्रुवम् surely, गुणतः by her virtues, विशिष्टा distinguished one, अथ now, महात्मा great, अयं लङ्केश्वरः that lord of Lanka, अस्याम् in her case, अनार्यम् an unfit act not befitting a noble one, कृतवान् did, कष्टम् alas.M N Dutt
Again reflected he, “Sītā is crowned with chastity and other virtues; and the powerful lord of Lankā, assuming an illusory form, has with much ado perpetrated this ignominious act.”Summary
Hanuman once again assuming his true form said to himself, 'Sita is surely a virtuous lady superior to and more distinguished than them all. Alas, this lord of Lanka committed an ignoble, act (by abducting her).इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे नवमस्सर्गः।Thus ends the ninth sarga of Sundarakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| पुनश्च | पुनर् (अव्ययः)–च (अव्ययः) |
| सो | तद् (१.१) |
| ऽचिन्तयद् | अचिन्तयत् (√चिन्तय् लङ् प्र.पु. एक.) |
| आर्तरूपो | आर्त–रूप (१.१) |
| ध्रुवं | ध्रुवम् (अव्ययः) |
| विशिष्टा | विशिष्ट (√वि-शिष् + क्त, १.१) |
| गुणतो | गुण (५.१) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| सीता | सीता (१.१) |
| अथायम् | अथ (अव्ययः)–इदम् (१.१) |
| अस्यां | इदम् (७.१) |
| कृतवान्महात्मा | कृतवत् (√कृ + क्तवतु, १.१)–महात्मन् (१.१) |
| लङ्केश्वरः | लङ्केश्वर (१.१) |
| कष्टम् | कष्ट (२.१) |
| अनार्यकर्म | अनार्य–कर्मन् (२.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पु | न | श्च | सो | ऽचि | न्त | य | दा | र्त | रू | पो |
| ध्रु | वं | वि | शि | ष्टा | गु | ण | तो | हि | सी | ता |
| अ | था | य | म | स्यां | कृ | त | वा | न्म | हा | त्मा |
| ल | ङ्के | श्व | रः | क | ष्ट | म | ना | र्य | क | र्म |