संतता शुशुभे भूमिर्माल्यैश्च बहुसंस्थितैः ।
हिरण्मयैश्च करकैर्भाजनैः स्फाटिकैरपि ।
जाम्बूनदमयैश्चान्यैः करकैरभिसंवृता ॥
संतता शुशुभे भूमिर्माल्यैश्च बहुसंस्थितैः ।
हिरण्मयैश्च करकैर्भाजनैः स्फाटिकैरपि ।
जाम्बूनदमयैश्चान्यैः करकैरभिसंवृता ॥
अन्वयः
बहुसंस्थितैः arranged in varied styles, माल्यैश्च with garlands, संतता strectched, हिरण्मयैः with those made of gold, स्फाटिकैरपि and crystalware, विविधैः several kinds, भाजनैः with vessels, जाम्बूनदमयैः made of pure gold, अन्यैः by others, करकैः with jars, अभिसंवृता spread all over, भूमिः floor, शुशुभे looked beautiful.Summary
(The banquet hall) appeared beautiful with many kinds of garlands arranged in different locations. Also there were vessels made of pure gold, crystalware and jars spread all over.पदच्छेदः
| संतता | संतत (√सम्-तन् + क्त, १.१) |
| शुशुभे | शुशुभे (√शुभ् लिट् प्र.पु. एक.) |
| भूमिर् | भूमि (१.१) |
| माल्यैश्च | माल्य (३.३)–च (अव्ययः) |
| बहुसंस्थितैः | बहु–संस्थित (√सम्-स्था + क्त, ३.३) |
| हिरण्मयैश्च | हिरण्मय (३.३)–च (अव्ययः) |
| करकैर् | करक (३.३) |
| भाजनैः | भाजन (३.३) |
| स्फाटिकैर् | स्फाटिक (३.३) |
| अपि | अपि (अव्ययः) |
| जाम्बूनदमयैश्चान्यैः | जाम्बूनद–मय (३.३)–च (अव्ययः)–अन्य (३.३) |
| करकैर् | करक (३.३) |
| अभिसंवृता | अभिसंवृत (√अभिसम्-वृ + क्त, १.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | त | ता | शु | शु | भे | भू | मि | र्मा | ल्यै | श्च | ब |
| हु | सं | स्थि | तैः | हि | र | ण्म | यै | श्च | क | र | कै |
| र्भा | ज | नैः | स्फा | टि | कै | र | पि | जा | म्बू | न | द |
| म | यै | श्चा | न्यैः | क | र | कै | र | भि | सं | वृ | ता |