अभ्यषिञ्चत्स धर्मात्मा शुद्धात्मानं विभीषणम् ।
तस्यामात्या जहृषिरे भक्ता ये चास्य राक्षसाः ॥
अभ्यषिञ्चत्स धर्मात्मा शुद्धात्मानं विभीषणम् ।
तस्यामात्या जहृषिरे भक्ता ये चास्य राक्षसाः ॥
पदच्छेदः
| अभ्यषिञ्चत् | अभ्यषिञ्चत् (√अभि-सिच् लङ् प्र.पु. एक.) |
| स | तद् (१.१) |
| धर्मात्मा | धर्म–आत्मन् (१.१) |
| शुद्धात्मानं | शुद्ध–आत्मन् (२.१) |
| विभीषणम् | विभीषण (२.१) |
| तस्यामात्या | तद् (६.१)–अमात्य (१.३) |
| जहृषिरे | जहृषिरे (√हृष् लिट् प्र.पु. बहु.) |
| भक्ता | भक्त (१.३) |
| ये | यद् (१.३) |
| चास्य | च (अव्ययः)–इदम् (६.१) |
| राक्षसाः | राक्षस (१.३) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भ्य | षि | ञ्च | त्स | ध | र्मा | त्मा |
| शु | द्धा | त्मा | नं | वि | भी | ष | णम् |
| त | स्या | मा | त्या | ज | हृ | षि | रे |
| भ | क्ता | ये | चा | स्य | रा | क्ष | साः |