कर्ता सर्वस्य लोकस्य श्रेष्ठो ज्ञानवतां वरः ।
उपेक्षसे कथं सीतां पतन्तीं हव्यवाहने ।
कथं देवगणश्रेष्ठमात्मानं नावबुध्यसे ॥
कर्ता सर्वस्य लोकस्य श्रेष्ठो ज्ञानवतां वरः ।
उपेक्षसे कथं सीतां पतन्तीं हव्यवाहने ।
कथं देवगणश्रेष्ठमात्मानं नावबुध्यसे ॥
अन्वयः
सर्वस्य all sides, लोकस्य in the world, कर्ता creator, ज्ञानवताम् knowledgeable, श्रेष्ठः foremost, प्रभुः Lord, हव्यवाहने fire, पतन्तीम् falling, सीताम् Sita, कथम् how, उपेक्षसे looking, देवगणश्रेष्ठम् foremost of the hosts of Devas, आत्मानम् himself, कथम् how, नावबुद्ध्यसे not know?M N Dutt
O lord, you are the preserver of all the worlds and the foremost of the wise, why did you neglect Sītā entering into fire? Why did you not understand yourself the foremost of the celestials?Summary
"You are the creator of the entire world, knowledgeable and the foremost Lord of the host of gods. How did you keep watching Sita falling into fire'?पदच्छेदः
| कर्ता | कर्तृ (१.१) |
| सर्वस्य | सर्व (६.१) |
| लोकस्य | लोक (६.१) |
| श्रेष्ठो | श्रेष्ठ (१.१) |
| ज्ञानवतां | ज्ञानवत् (६.३) |
| वरः | वर (१.१) |
| उपेक्षसे | उपेक्षसे (√उप-ईक्ष् लट् म.पु. ) |
| कथं | कथम् (अव्ययः) |
| सीतां | सीता (२.१) |
| पतन्तीं | पतत् (√पत् + शतृ, २.१) |
| हव्यवाहने | हव्यवाहन (७.१) |
| कथं | कथम् (अव्ययः) |
| देवगणश्रेष्ठम् | देव–गण–श्रेष्ठ (२.१) |
| आत्मानं | आत्मन् (२.१) |
| नावबुध्यसे | न (अव्ययः)–अवबुध्यसे (√अव-बुध् लट् म.पु. ) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | र्ता | स | र्व | स्य | लो | क | स्य | श्रे | ष्ठो | ज्ञा | न |
| व | तां | व | रः | उ | पे | क्ष | से | क | थं | सी | तां |
| प | त | न्तीं | ह | व्य | वा | ह | ने | क | थं | दे | व |
| ग | ण | श्रे | ष्ठ | मा | त्मा | नं | ना | व | बु | ध्य | से |