स तथोक्त्वा महाबाहुर्लक्ष्मणं प्राञ्जलिं स्थितम् ।
उवाच राजा धर्मात्मा वैदेहीं वचनं शुभम् ॥
स तथोक्त्वा महाबाहुर्लक्ष्मणं प्राञ्जलिं स्थितम् ।
उवाच राजा धर्मात्मा वैदेहीं वचनं शुभम् ॥
पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| तथोक्त्वा | तथा (अव्ययः)–उक्त्वा (√वच् + क्त्वा) |
| महाबाहुर् | महत्–बाहु (१.१) |
| लक्ष्मणं | लक्ष्मण (२.१) |
| प्राञ्जलिं | प्राञ्जलि (२.१) |
| स्थितम् | स्थित (√स्था + क्त, २.१) |
| उवाच | उवाच (√वच् लिट् प्र.पु. एक.) |
| राजा | राजन् (१.१) |
| धर्मात्मा | धर्म–आत्मन् (१.१) |
| वैदेहीं | वैदेही (२.१) |
| वचनं | वचन (२.१) |
| शुभम् | शुभ (२.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | त | थो | क्त्वा | म | हा | बा | हु |
| र्ल | क्ष्म | णं | प्रा | ञ्ज | लिं | स्थि | तम् |
| उ | वा | च | रा | जा | ध | र्मा | त्मा |
| वै | दे | हीं | व | च | नं | शु | भम् |