मन्त्रयन्रामवृद्ध्यर्थं वृत्त्यर्थं नगरस्य च ।
सर्वमेवाभिषेकार्थं जयार्हस्य महात्मनः ।
कर्तुमर्हथ रामस्य यद्यन्मङ्गलपूर्वकम् ॥
मन्त्रयन्रामवृद्ध्यर्थं वृत्त्यर्थं नगरस्य च ।
सर्वमेवाभिषेकार्थं जयार्हस्य महात्मनः ।
कर्तुमर्हथ रामस्य यद्यन्मङ्गलपूर्वकम् ॥
अन्वयः
जयार्हस्य for the success, महात्मनः of great soul, रामस्य Rama's, अभिषेकार्थम् for the consecration, यद्यत् Whatever, सर्वम् all, मङ्गलपूर्वकम् auspicious, कर्तुम् to do, अर्हथ who deservesM N Dutt
(Thereupon they ordered the servants) saying, Do you collect materials necessary for the auspicious installation of the high-souled (Rama) worthy of being crowned with victory.Summary
For the success of the great soul Rama's consecration, whatever was auspicious, all that ought to be done as he deserves.पदच्छेदः
| मन्त्रयन् | मन्त्रयन् (√मन्त्रय् लङ् प्र.पु. बहु.) |
| रामवृद्ध्यर्थं | राम–वृद्धि–अर्थ (२.१) |
| वृत्त्यर्थं | वृत्ति–अर्थ (२.१) |
| नगरस्य | नगर (६.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| सर्वम् | सर्व (२.१) |
| एवाभिषेकार्थं | एव (अव्ययः)–अभिषेक–अर्थ (२.१) |
| जयार्हस्य | जय–अर्ह (६.१) |
| महात्मनः | महात्मन् (६.१) |
| कर्तुम् | कर्तुम् (√कृ + तुमुन्) |
| अर्हथ | अर्हथ (√अर्ह् लट् म.पु. द्वि.) |
| रामस्य | राम (६.१) |
| यद् | यद् (१.१) |
| यन् | यद् (१.१) |
| मङ्गलपूर्वकम् | मङ्गल–पूर्वक (१.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | न्त्र | य | न्रा | म | वृ | द्ध्य | र्थं | वृ | त्त्य | र्थं | न |
| ग | र | स्य | च | स | र्व | मे | वा | भि | षे | का | र्थं |
| ज | या | र्ह | स्य | म | हा | त्म | नः | क | र्तु | म | र्ह |
| थ | रा | म | स्य | य | द्य | न्म | ङ्ग | ल | पू | र्व | कम् |