तदद्भुतं राघव कर्म दुष्करं; समीक्ष्य देवाः सह सिद्धचारणैः ।
उपेत्य रामं सहिता महर्षिभिः; समभ्यषिञ्चन्सुशुभैर्जलैः पृथक् ॥
तदद्भुतं राघव कर्म दुष्करं; समीक्ष्य देवाः सह सिद्धचारणैः ।
उपेत्य रामं सहिता महर्षिभिः; समभ्यषिञ्चन्सुशुभैर्जलैः पृथक् ॥
अन्वयः
देवाः gods, सिद्धचारणैः siddhas and charanas, महर्षिभिःसह including sages, अद्भुतम् wonderful, दुष्करम् most difficult, तत् that is, राघवकर्म Rama's action, समीक्ष्य seeing, सहसा at once, रामम् to Rama, उपेत्य, reached towards, सुशुभैः auspicious, जलैः water, पृथक् each one separately, तम् him, अभ्यषिञ्चन् sprinkledM N Dutt
Beholding that work of Rāghava incapable of being performed the deities together with the Siddhas and Caranas, and the Maharsis, suddenly presenting themselves before Rāma, sprinkled him one by one with sacred water, and said.Summary
At once the gods, siddhas, charanas and sages came towards Rama looking at his wonderful and most difficult action and sprinkled auspicious water on him individually. (As a mark of worship and blessing).पदच्छेदः
| तद् | तद् (२.१) |
| अद्भुतं | अद्भुत (२.१) |
| राघवकर्म | राघव–कर्मन् (२.१) |
| दुष्करं | दुष्कर (२.१) |
| समीक्ष्य | समीक्ष्य (√सम्-ईक्ष् + ल्यप्) |
| देवाः | देव (१.३) |
| सह | सह (अव्ययः) |
| सिद्धचारणैः | सिद्ध–चारण (३.३) |
| उपेत्य | उपेत्य (√उप-इ + ल्यप्) |
| रामं | राम (२.१) |
| सहिता | सहित (१.३) |
| महर्षिभिः | महत्–ऋषि (३.३) |
| समभ्यषिञ्चन् | समभ्यषिञ्चन् (√समभि-सिच् लङ् प्र.पु. बहु.) |
| सुशुभैर् | सु (अव्ययः)–शुभ (३.३) |
| जलैः | जल (३.३) |
| पृथक् | पृथक् (अव्ययः) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | द | द्भु | तं | रा | घ | व | क | र्म | दु | ष्क | रं |
| स | मी | क्ष्य | दे | वाः | स | ह | सि | द्ध | चा | र | णैः |
| उ | पे | त्य | रा | मं | स | हि | ता | म | ह | र्षि | भिः |
| स | म | भ्य | षि | ञ्च | न्सु | शु | भै | र्ज | लैः | पृ | थक् |
| ज | त | ज | र | ||||||||