सोऽन्तर्धान गतः पापो रावणी रणकर्कशः ।
ब्रह्मदत्तवरो वीरो रावणिः क्रोधमूर्छितः ।
अदृश्यो निशितान्बाणान्मुमोचाशनिवर्चसः ॥
सोऽन्तर्धान गतः पापो रावणी रणकर्कशः ।
ब्रह्मदत्तवरो वीरो रावणिः क्रोधमूर्छितः ।
अदृश्यो निशितान्बाणान्मुमोचाशनिवर्चसः ॥
अन्वयः
पापः sinful, रणकर्कशः capable of encounter, सःरावणि that Ravana, अदृश्यः rising up, अशनिवर्चसः remaining invisible, निशितान् sharp arrows, बाणान् by arrows, मुमोच remained.M N Dutt
And, being handled hard in battle, and having vanished from the field, the heroic and wicked son to Răvana, who had received a boon from Brahmä, transported with passion, remaining invisible, began to discharge sharpened shafts of the splendour of the thunder-bolt.Summary
That sinful son of Ravana, who is capable of encountering rising up remained invisible and shot sharp arrows.पदच्छेदः
| सो | तद् (१.१) |
| ऽन्तर्धानगतः | अन्तर्धान–गत (√गम् + क्त, १.१) |
| पापो | पाप (१.१) |
| रावणिः | रावणि (१.१) |
| रणकर्कशः | रण–कर्कश (१.१) |
| ब्रह्मदत्तवरो | ब्रह्मन्–दत्त (√दा + क्त)–वर (१.१) |
| वीरो | वीर (१.१) |
| रावणिः | रावणि (१.१) |
| क्रोधमूर्छितः | क्रोध–मूर्छित (√मूर्छय् + क्त, १.१) |
| अदृश्यो | अदृश्य (१.१) |
| निशितान् | निशित (√नि-शा + क्त, २.३) |
| बाणान्मुमोचाशनिवर्चसः | बाण (२.३)–मुमोच (√मुच् लिट् प्र.पु. एक.)–अशनि–वर्चस् (२.३) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सो | ऽन्त | र्धा | न | ग | तः | पा | पो | रा | व | णी | र |
| ण | क | र्क | शः | ब्र | ह्म | द | त्त | व | रो | वी | रो |
| रा | व | णिः | क्रो | ध | मू | र्छि | तः | अ | दृ | श्यो | नि |
| शि | ता | न्बा | णा | न्मु | मो | चा | श | नि | व | र्च | सः |