ततो नगर्याः सहसा महौजा; निष्क्रम्य तद्वानरसैन्यमुग्रम् ।
महार्णवाभ्रस्तनितं ददर्श; समुद्यतं पादपशैलहस्तम् ॥
ततो नगर्याः सहसा महौजा; निष्क्रम्य तद्वानरसैन्यमुग्रम् ।
महार्णवाभ्रस्तनितं ददर्श; समुद्यतं पादपशैलहस्तम् ॥
अन्वयः
ततः thereafter, महौजाः possessed with great splendour, सहसा forcibly, नगर्याः at the city, निष्क्रम्य stopped, उग्रम् in front, महार्णवाभ्रस्तनितम् resembling great ocean and cloud, समुद्यतम् collected together, पादपशैलहस्तम् taking trees and rocks, तत् वानरसैन्यम् the Vanara army, ददर्श saw.M N Dutt
At once issuing from the city, that one endowed with high energy saw that fierce array of monkeys, extended as the ocean or a mighty mass of clouds, with arms upraised with rocks and stones.Summary
Thereafter, Ravana possessed with great splendour stopped at the city and saw the army of Vanaras collected together looking like an ocean of clouds wielding trees and rocks.पदच्छेदः
| ततो | ततस् (अव्ययः) |
| नगर्याः | नगरी (५.१) |
| सहसा | सहस् (३.१) |
| महौजा | महत्–ओजस् (१.१) |
| निष्क्रम्य | निष्क्रम्य (√निः-क्रम् + ल्यप्) |
| तद् | तद् (२.१) |
| वानरसैन्यम् | वानर–सैन्य (२.१) |
| उग्रम् | उग्र (२.१) |
| महार्णवाभ्रस्तनितं | महत्–अर्णव–अभ्र–स्तनित (२.१) |
| ददर्श | ददर्श (√दृश् लिट् प्र.पु. एक.) |
| समुद्यतं | समुद्यत (√समुत्-यम् + क्त, २.१) |
| पादपशैलहस्तम् | पादप–शैल–हस्त (२.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तो | न | ग | र्याः | स | ह | सा | म | हौ | जा |
| नि | ष्क्र | म्य | त | द्वा | न | र | सै | न्य | मु | ग्रम् |
| म | हा | र्ण | वा | भ्र | स्त | नि | तं | द | द | र्श |
| स | मु | द्य | तं | पा | द | प | शै | ल | ह | स्तम् |