तं निर्विषाशीविषसंनिकाशं; शान्तार्चिषं सूर्यमिवाप्रकाशम् ।
गतश्रियं कृत्तकिरीटकूट;मुवाच रामो युधि राक्षसेन्द्रम् ॥
तं निर्विषाशीविषसंनिकाशं; शान्तार्चिषं सूर्यमिवाप्रकाशम् ।
गतश्रियं कृत्तकिरीटकूट;मुवाच रामो युधि राक्षसेन्द्रम् ॥
अन्वयः
रामः Rama, युधि in combat, निर्विषाशीविषसन्निकाशम् resembling a serpent rid of poison without his crown, शान्तार्चिषम् without splendour, सूर्यमिव like sun, अप्रकाशम् without brightness, गतश्रियम् glory lost, कृत्तकिरीटकूटम् crown being torn, तंराक्षसेन्द्रम् that king of Rakshasas, उवाच said.M N Dutt
Rāma in the encounter addressed the lord of Rākşasas, resembling a serpent bereft of venom, shorn of his splendour, like to the sun shrouded (in mist), without his wonted grace, and having his entire tiara riven-saying.Summary
Rama said to the king of Rakshasas, who was like a serpent rid of poison without (head) crown, without splendour like the Sun without brightness, his glory lost with the crown broken in the combat.पदच्छेदः
| तं | तद् (२.१) |
| निर्विषाशीविषसंनिकाशं | निर्विष–आशीविष–संनिकाश (२.१) |
| शान्तार्चिषं | शान्त (√शम् + क्त)–अर्चिस् (२.१) |
| सूर्यम् | सूर्य (२.१) |
| इवाप्रकाशम् | इव (अव्ययः)–अप्रकाश (२.१) |
| गतश्रियं | गत (√गम् + क्त)–श्री (२.१) |
| कृत्तकिरीटकूटम् | कृत्त (√कृत् + क्त)–किरीट–कूट (२.१) |
| उवाच | उवाच (√वच् लिट् प्र.पु. एक.) |
| रामो | राम (१.१) |
| युधि | युध् (७.१) |
| राक्षसेन्द्रम् | राक्षस–इन्द्र (२.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तं | नि | र्वि | षा | शी | वि | ष | सं | नि | का | शं |
| शा | न्ता | र्चि | षं | सू | र्य | मि | वा | प्र | का | शम् |
| ग | त | श्रि | यं | कृ | त्त | कि | री | ट | कू | ट |
| मु | वा | च | रा | मो | यु | धि | रा | क्ष | से | न्द्रम् |