स तं गृहीत्वानिलतुल्यवेगं; सविस्फुलिङ्गज्वलनप्रकाशम् ।
बाणं महेन्द्राशनितुल्यवेगं; चिक्षेप सुग्रीववधाय रुष्टः ॥
स तं गृहीत्वानिलतुल्यवेगं; सविस्फुलिङ्गज्वलनप्रकाशम् ।
बाणं महेन्द्राशनितुल्यवेगं; चिक्षेप सुग्रीववधाय रुष्टः ॥
अन्वयः
रुष्टः angry, सः he, अनिलतुल्यवेगम् like the wind in speed, सविस्फुलिङ्गज्वलनप्रकाशम् shone like sparks of fire, महेन्द्राशनितुल्यवेगम् vied with thunderbolt of Indra in speed, तंबाणम् that arrow, गृहीत्वा seizing, सुग्रीववधाय for the destruction of Sugriva, चिक्षेप released.M N Dutt
Taking that shaft endowed with the vehemence of the wind, flaming like a fire aglow, and having the impetuosity of the great Indra's thunder-bolt, (Ravana) hurled it in rage to compass the destruction of Sugrīva.Summary
Seizing an arrow which shone like sparks of fire and had the speed of wind, nay vied with thunderbolt of Indra in speed, he (Ravana) released an arrow in anger.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| तं | तद् (२.१) |
| गृहीत्वानिलतुल्यवेगं | गृहीत्वा (√ग्रह् + क्त्वा)–अनिल–तुल्य–वेग (२.१) |
| सविस्फुलिङ्गज्वलनप्रकाशम् | स (अव्ययः)–विस्फुलिङ्ग–ज्वलन–प्रकाश (२.१) |
| बाणं | बाण (२.१) |
| महेन्द्राशनितुल्यवेगं | महत्–इन्द्र–अशनि–तुल्य–वेग (२.१) |
| चिक्षेप | चिक्षेप (√क्षिप् लिट् प्र.पु. एक.) |
| सुग्रीववधाय | सुग्रीव–वध (४.१) |
| रुष्टः | रुष्ट (√रुष् + क्त, १.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | तं | गृ | ही | त्वा | नि | ल | तु | ल्य | वे | गं |
| स | वि | स्फु | लि | ङ्ग | ज्व | ल | न | प्र | का | शम् |
| बा | णं | म | हे | न्द्रा | श | नि | तु | ल्य | वे | गं |
| चि | क्षे | प | सु | ग्री | व | व | धा | य | रु | ष्टः |