सकृत्तु प्रहरेदानीं दुर्बुद्धे किं विकत्थसे ।
ततस्त्वां मामको मुष्टिर्नयिष्यामि यथाक्षयम् ।
ततो मारुतिवाक्येन क्रोधस्तस्य तदाज्वलत् ॥
सकृत्तु प्रहरेदानीं दुर्बुद्धे किं विकत्थसे ।
ततस्त्वां मामको मुष्टिर्नयिष्यामि यथाक्षयम् ।
ततो मारुतिवाक्येन क्रोधस्तस्य तदाज्वलत् ॥
अन्वयः
दुर्भुद्धे evil minded, किंविकत्थसे why do you brag, इदानीम् like this, सकृत् once more you do, प्रहर strike, ततः then, मामिकः I will once again, मुष्टिः fist, त्वाम् you, यमक्षयम् to the abode of Yama, नयिष्यति I wish.M N Dutt
Strike at the same time, O perverse one. Why did you bluster? And then my blow shall despatch you to the mansions of Yama.Summary
"O evil minded one, why do you brag You do this once more I will strike you once again with my fist and send you to the abode of Yama."पदच्छेदः
| सकृत् | सकृत् (अव्ययः) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| प्रहरेदानीं | प्रहर (√प्र-हृ लोट् म.पु. )–इदानीम् (अव्ययः) |
| दुर्बुद्धे | दुर्बुद्धि (८.१) |
| किं | क (२.१) |
| विकत्थसे | विकत्थसे (√वि-कत्थ् लट् म.पु. ) |
| ततस्त्वां | ततस् (अव्ययः)–त्वद् (२.१) |
| मामको | मामक (१.१) |
| मुष्टिर् | मुष्टि (१.१) |
| नयिष्यति | नयिष्यति (√नी लृट् प्र.पु. एक.) |
| यमक्षयम् | यम–क्षय (२.१) |
| ततो | ततस् (अव्ययः) |
| मारुतिवाक्येन | मारुति–वाक्य (३.१) |
| क्रोधस्तस्य | क्रोध (१.१)–तद् (६.१) |
| तदाज्वलत् | तदा (अव्ययः)–अज्वलत् (√ज्वल् लङ् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | कृ | त्तु | प्र | ह | रे | दा | नीं | दु | र्बु | द्धे | किं |
| वि | क | त्थ | से | त | त | स्त्वां | मा | म | को | मु | ष्टि |
| र्न | यि | ष्या | मि | य | था | क्ष | यम् | त | तो | मा | रु |
| ति | वा | क्ये | न | क्रो | ध | स्त | स्य | त | दा | ज्व | लत् |